कविता

दीप जलायें

चलो एक दीप जलायें
मन के किसी कोने मे
तिमिर को भगाकर
उजाला लाये उस कोने मे
राग द्वेष से भरे पड़े है
दिल और दिमाग जो कूंठित हुये है
सब को निकाल बाहर फेके
ज्योति की तरह प्रकाशित हो
स्वच्छ,निर्मल धारा प्रवाहित हो

कल अमावस्या की रात है
लेकिन मन में पूर्णिमा की आस है
मिट गये जो मन का मैल
तो फिर क्या अमावस्या क्या पूर्णिमा है
रंग बिरंग के रंगो वाली रंगोली
सतरंगी होगी इसबार दीवाली
दीपो के पावन पर्व मे
हम सब जो साथ-साथ है
तो चलो मिल दीप जलायें
सभी द्वेष भूल गले लगायें।
निवेदिता चतुर्वेदी’निव्या’

निवेदिता चतुर्वेदी

बी.एसी. शौक ---- लेखन पता --चेनारी ,सासाराम ,रोहतास ,बिहार , ८२११०४