धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ईश्वर के गुणों, उपकारों का स्मरण व उसका धन्यवाद सन्ध्या है

ओ३म्

मनुष्य जो भी काम करता है वह विचार कर ही करता है। जो मनुष्य विचार किये बिना काम करे उसे पागल कहा जाता है। हमें भूख लगती है तो भूख की निवृत्ति के लिए विचार कर हितकर भोजन करते हैं। इसी प्रकार कोई भी कार्य करें तो पहले सोचते हैं फिर उसके अनुरूप करते हैं। ऐसा करना ही उचित माना जाता है। हमें इन सामान्य कार्यों के अतिरिक्त अपने बारे में भी विचार करना चाहिये कि हम क्या व कौन हैं? जब हम क्या हैं प्रश्न पर विचार करते हैं तो हमें इसके कई उत्तर सूझते हैं। हम कई बार स्वयं ही उन उत्तरों से सन्तुष्ट नहीं हो पाते। दूसरों से पूछते हैं तो उनके उत्तर भी अलग अलग होते हैं। कौन सा उत्तर ठीक है या सभी गलत है यह निर्णय करना होता है परन्तु प्रायः सामान्य लोगयह कार्य भी नहीं कर पाते। इसके लिए सरल उपाय है कि हम वेदों पर आधारित सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय करें। इससे हमें इस प्रश्न का कि हम क्या हैं व कौन हैं, सही उत्तर मिल जाता है। सही उत्तर क्या है? प्रथम बात तो यह है कि हम जड़ शरीर नहीं जो हमें व दूसरों को दिखाई देता है। हम एक जीवित शरीर में विद्यमान एक चेतन पदार्थ जिसे जीवात्मा कहते हैं, वह हैं। जड़ पदार्थ वह होता है तो संवेदना शून्य होता है और चेतन पदार्थ वह होता है जो संवेदनशील होता है। हमारे हाथ में यदि सुई चुभोई जाये तो पीड़ा होने से हमारी चीख निकल पड़ती है। किसी जड़ पदार्थ पुस्तक या वनस्पति में भी यही क्रिया की जाये तो उन पर सुई चुभोने का कोई प्रभाव नहीं होता। जीवित शरीर में सुई चुभने से पीड़ा होती है परन्तु मृतक शरीर को सुई चुभाई जाये या उसका पोस्टमार्टम या चीर फाड़ कर दी जाये फिर भी कोई असर नहीं होता। इससे सिद्ध हो जाता है कि मृतक शरीर जड़ है और जीवित शरीर में एक चेतन तत्व है जो आंखों से दिखाई नहीं देता परन्तु वह शरीर के भीतर है अवश्य और उसे इच्छा, द्वेष, सुख, दुख व प्रयत्न आदि की क्रियाओं व लिंगो से पहचाना जाता है।

सत्यार्थप्रकाश अथवा ऋषि दयानन्द के कुछ अन्य ग्रन्थों के आधार पर आत्मा का अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि यह आत्मा अनादि, अविनाशी, नित्य व अमर पदार्थ, तत्व व सत्ता है। इसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई है। जिस पदार्थ की उत्पत्ति होती है उसका नाश भी अवश्य होता है। इसके विपरीत कुछ अनादि पदार्थ होते हैं जिनसे व जिनके द्वारा उत्पत्ति की जा सकती है परन्तु इन मूल पदार्थों का नाश वा अभाव कभी नहीं होता। मूल अनादि पदार्थ मुख्यतः तीन हैं जिनके नाम हैं ईश्वर जीवन और प्रकृति। इन तीन पदार्थों में ईश्वर व जीव चेतन पदार्थ हैं और प्रकृति जड़ हैं। प्रकृति अति सूक्ष्म त्रिगुणात्मक सत्, रज व तम गुणों वाली है। मूल प्रकृति सूक्ष्म परमाणु रूप में होती है। इस जड़ प्रकृति से ही ईश्वर जीवात्माओं के लिए इस सृष्टि का निर्माण करता है। प्रकृति का पहला विकार महतत्व व दूसरा अहंकार कहलाता है। इसके बाद पांच तन्मात्रायें बनती हैं और बाद में पांच स्थूल भूत। यह सृष्टि प्रकृति से निर्मित परमात्मा की रचना है जिसे जड़ प्रकृति के परमाणुओं के संयोग से परमात्मा ने जीवों के पूर्व जन्मों के कर्मफलों का भोग कराने के लिए उत्पन्न किया है। सृष्टि में हमारा वर्तमान जन्म पूर्वजन्म व जन्मों के कर्मफलों के भोग के लिए हुआ है। हम जो भी हैं वह हमारे पूरे अतीत का परिणाम है और हमारा भविष्य हमारे अतीत व वर्तमान के कर्मों का परिणाम होगा। जीवात्मा के बारे में यह भी जान लें कि यह सूक्ष्म, एकदेशी, ससीम, जन्म-मरण धर्मा, स्वतन्त्रता से कर्मों को करने वाली और फल भोगने में ईश्वर के अधीन नित्य सत्ता है। ईश्वर सभी जीवात्माओं के जन्म जन्मान्तरों के सभी कर्मों के साक्षी हैं। हम कोई भी कर्म करते हैं, वह आत्मा के भीतर विद्यमान परमात्मा को पूरा पूरा यहां तक की मन व आत्मा के विचार भी उसे विदित होते हैं। ईश्वर से संसार, किसी मनुष्य व प्राणी की कोई बात छिपी नहीं रहती न हम छिपा ही सकते हैं। ईश्वर का स्वरूप सच्चिदानन्दादि गुणों से युक्त है। वह निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। ईश्वर वेद ज्ञान व भाषा का दाता, कर्मानुसार जीवों को जन्म देने वाला व कर्म-फल प्रदाता है। उसी परमात्मा की जीवात्मा व मनुष्य के द्वारा गुण, कीर्तन, स्मरण, कृतज्ञता ज्ञापन, ध्यान, चिन्तन, स्वाध्याय आदि द्वारा उपासना करनी कर्तव्य है।

मनुष्य को यह जीवन अपने पूर्वजन्मों के कर्मों के आधार पर ईश्वर से मिला है। वेद ज्ञानी व ईश्वर का साक्षात्कार किये ऋषि व योगी बताते हैं कि जब मनुष्य के कर्मों के खाते में पाप व पुण्य बराबर या पुण्य कर्म अधिक होते हैं तो उसे मनुष्य जन्म मिलता है अन्यथा पाप कर्मों के अधिक होने पर पशु, पक्षी, कीट व पतंग आदि अनेक योनियों में से कोई एक योनि मिलती है। मनुष्य जन्म के मुख्यतः दो उद्देंश्य ज्ञात होते हैं। प्रथम पूर्व जन्म के कर्मों का भोग और दूसरा कर्म बन्धनों से छूटने के लिए सन्मार्ग वा वेद मार्ग पर चलकर ईश्वर साक्षात्कार कर विवेक की प्राप्ति करना जिससे मनुष्य की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। मोक्ष वह अवस्था होती है जिसमें बहुत लम्बे समय के लिए मनुष्य जन्म मरण के चक्र से छूट जाता है। मनुष्य को इन दो उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही सत्कर्मों को करने का विधान वैदिक शास्त्रों व ग्रन्थों में किया गया है। ऋषियों व योगियों का जीवन भी आत्मा की उन्नति के लिए ही उपाय करने वाला जीवन होता है जिससे उनका परजन्म सुधरता है और जीवन में विवेक प्राप्त कर वेदज्ञानी योगियों को मोक्ष प्राप्त होता है। मोक्ष के साधनों की चर्चा सत्यार्थप्रकाश में मिलती है जिसे पाठक वहां देख सकते हैं। सत्यार्थप्रकाश की पीडीएफ नैट पर भी उपलब्ध होती है। यदि कोई चाहे तो उसे इमेल भी कर सकते हैं।

मनुष्य जीवन में सुख व शान्ति चाहता है जिसका आधार मनुष्य के शुभ व पुण्य कर्म होते हैं। शुभ कर्मों को करना ही धर्म कहाता है। हिन्दू ईसाई व इस्लाम आदि मजहब या मत मतान्तर हैं। धर्म तो सबका एक ही होता है और वह शुभ कर्मों का आचरण होता है जिसे एक शब्द में सत्याचार भी कह सकते हैं। इन कर्तव्यों का ज्ञान वेद व वेदानुकूल सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर भी प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य जीवन की उन्नति के लिए ऋषियों ने पंचमहायज्ञों का विधान किया है। इन पंचमहायज्ञों में ब्रह्म यज्ञ वा सन्ध्या का प्रथम स्थान है। इतर चार महायज्ञ देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ व बलिवैश्वदेवयज्ञ हैं। प्रथम ब्रह्म यज्ञ वा सन्ध्या ईश्वर का भली भांति ध्यान करने को कहते हैं। इसके भी दो भाग है जिसमें प्रथम ईश्वर के गुणों के चिन्तन सहित उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना कर्तव्य है। दूसरा स्वाध्याय होता है। स्वाध्याय का अर्थ अपनी आत्मा का चिन्तन कर उसके यथार्थ निर्भ्रान्त स्वरूप का ज्ञान व वेद आदि शास्त्रों सहित ऋषियों के वेदानुकूल ग्रन्थों का अध्ययन करना होता है। यही ईश्वर की पूजा भी है। इससे भिन्न ईश्वर की कोई पूजा नहीं होती। ईश्वर आज्ञा का पालन करना और उसके विपरीत कोई कर्म वा कार्य न करना ही ईश्वर की पूजा है। ईश्वर की आज्ञा वही है जो वेदों में वर्णित हैं। ब्रह्म यज्ञ वा सन्ध्या में ईश्वर का चिन्तन करते हुए उसके स्वरूप को अपनी स्मृति में लाना, उसके गुणों को स्मरण करना, उसके उपकारों व कार्यों का ध्यान करना, ओ३म् व गायत्री मंत्र का जप तथा ऐसा करते हुए परमेश्वर का धन्यवाद करना ही सन्ध्या है। इसके लिए स्वामी दयानन्द जी ने सन्ध्या विधि का निर्माण भी किया है जो पंचमहायज्ञविधि पुस्तक में उपलब्ध है। सन्ध्या के मंत्रों का उच्चारण व पाठ अर्थ सहित करना चाहिये। इसके लिए पंच महायज्ञ विधि से सन्ध्या करते हुए मन्त्र बोल कर ध्यान पूर्वक मन्त्रों के अर्थां का पाठ कर सकते हैं और उन अर्थों का व्यापक रूप से चिन्तन भी कर सकते हैं। ऐसा करने से ईश्वर के प्रति प्रेम व मित्रता स्थापित होने के साथ दुगुर्णों की निवृति होती है और गुणों में वृद्धि होती है।

सन्ध्या के मंत्रों व उसके अर्थों का पाठ व चिन्तन कर लेने के बाद कुछ समय बिना पुस्तक की सहायता के शान्त चित्त से ईश्वर का ध्यान, चिन्तन, स्तुति व प्रार्थना भी कर सकते हैं। उसके बाद शेष समय में वेद भाष्य वा ऋषि के आर्याभिविनय सहित आर्य विद्वानों के ग्रन्थ वेद मंजरी, वैदिक सन्दोह, वैदिक विनय, श्रुति सौरभ, सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, सन्मार्ग दर्शन, ऋग्वेद ज्योति, यजुर्वेद ज्योति, अथर्ववेद ज्योति आदि का एकाग्रता के साथ पाठ व उस पर चिन्तन व मनन कर सकते हैं। ऐसा करना ही ईश्वर का ध्यान व सन्ध्या प्रतीत होता है। सन्ध्या पर अनेक प्रमुख आर्य विद्वानों ने टीकायें आदि भी लिखी हैं। उनका भी अध्ययन किया जा सकता है। यह टीकायें पं. विश्वनाथ वेदालंकार, पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय, स्वामी आत्मानन्द सरस्वती, पं. चमूपति, स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी आदि की पठनीय है। सन्ध्या प्रातः व सायं दो समय की जाती है और ऋषि दयानन्द के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को एक समय में न्यूनतम एक घंटा करनी चाहिये। हम अनुमान करते हैं कि इस विधि से आत्मोन्नति की जा सकती है। शीर्ष विद्वान अनेक मार्ग सुझा सकते हैं। योग्य विद्वानों की शरण में जाकर योग विधि से उपासना करनी चाहिये। हमने इस विषय को सरल व संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। हमें नहीं पता कि यह कितना उपयोगी है। इतना ही कह सकते हैं कि ऐसा करके आप ईश्वर उपासना के मार्ग में पहला कदम तो रख ही सकते हैं। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य