लघुकथा

परिवर्तन

मम्मी! “ऑन लाइन आर्डर कर दूँगा, या चलिए मॉल से दिला दूँगा| वह भी बहुत खूबसूरत-बढ़िया दीये। चलिए यहाँ से| इन गँवारो की भाषा समझ नहीं आती, ऊपर से रिरियाते हुए पीछे ही पड़ जाते हैं|”
मम्मी उस दूकान से आगे फुटपाथ पर बैठी एक बुढ़िया की ओर बढ़ी। उसके दीये खरीदने को, जमीन में बैठकर ही चुनने लगीं|
“क्या मम्मी, आप ने तो मेरी बेइज्जती करा दी, मैं ‘हाईकोर्ट का जज’ और मेरी माँ जमींन पर बैठी दीये खरीद रही है| जानती हो कैसेकैसे बोल बोलेंगे लोग| ‘जज साहब’ ….”
बीच में ही माँ आहत हो बोली …”इसी जमीन में बैठकर ही दस साल तक सब्जी बेची है, और कई तेरी जैसो की मम्मियों ने ही ख़रीदा है मुझसे सब्जी, तब जाके आज तू बोल पा रहा है।”

संदीप विस्फारित आंखों से माँ को बस देखता रह गया।

“वह दिन तू भले भूल गया बेटा, पर मैं कैसे भुलू भला| तेरे मॉल से या ऑनलाइन दीये तो मिल जायेंगे, पर दिल कैसे मिलेंगे भला?”

दीये बेचने वाली बुढ़िया नम आँखों से बोली- “हमार पोता भी इही छोट मोट काम भरोसे पढ़ी रहा है। बेटवा मूरति की रेहड़ी लगाए बा उहा।” कहकर ऊँगली दिखा दी। मम्मी उस दुकान की ओर बढ़ी तो संदीप तिलमिलाया लेकिन उस गरीब बुढ़िया की आँखों के आँसू मोती से चमक उठे।

*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|