Monthly Archives: October 2017

  • “लोहे की सड़सी”

    “लोहे की सड़सी”

    जय हो झिनकू भैया की। भौजी की अँगुली चाय की खौलती तपेली से सट गई, तो ज़ोर से झनझना गई भौजी, झिनकू भैया के बासी चाय पर। चार दिन से कह रहीं हूँ कि सड़सी टूट...

  • “रतिलेखा छंद”

    “रतिलेखा छंद”

    अब तो गिरिवर दरशन, चित हमारौ मनवा हरसत विहरत, हरि निहारौ। पहुना सम दिखत सबहिं, पग पखारौ हम सेवक तुम रघुबर, गृह पधारौ।। अपना सब कुछ अरपन, तव सहारौ विधना नयनन चितवत, छवि तिहारौ। अपने कमल...


  • गज़ल

    गज़ल

    मेरी जिंदगी की भी एक अजीब सी दास्ताँ रही जैसे किसी बच्चे की खिलौने में अटकी जाँ रही जमी जायदाद सोना चाँदी रख दिया मेरे भाई ने मेरी नजरों में सबसे बड़ी दौलत वो मेरी माँ...

  • गज़ल

    गज़ल

    हसीन रातों से भरा हुआ तूम्हे मंजर दिखाऊंगा फुर्सत मिले तो आना मैं अपना घर दिखाऊंगा बहारों मे सुख जाया करते होंगे वो तेरे शहर में पतझड़ मे खिला मैं गाँव का शजर दिखाऊंगा मेरी आँखो...


  • सोचने का ठेका

    सोचने का ठेका

    नेता अवनी प्रसाद प्रचंड मतों से लोकसभा के लिए चुने गए थे । मंत्री बना दिये गए । जीत की खुमारी उतरने के बाद अवनी प्रसाद को कुछ करने की धुन सवार हुई । अपनी ही...


  • गोधूली

    गोधूली

    राजेंद्र बाबू छत पर अकेले बैठे थे। धूप कब की ढल चुकी थी। अंधेरा हो रहा था। लेकिन बढ़ती ठंड में वह चारपाई पर वह हाथ पांव सिकोड़ कर बैठे थे। पत्नी विभा को इलाज के...

  • समाज के कोढ़ (2)

    समाज के कोढ़ (2)

    ज्यों ज्यों लघुकथा सम्मेलन का दिन करीब आता जा रहा है , त्यों त्यों एक नई लघुकथा जन्म ले रही है एक महोदय ने आयोजनकर्त्ताओं में से किसी एक को फोन किया -हैलो!” -मैं xyz बोल...