गीतिका/ग़ज़ल

आज के रावण

उस रावण जैसी मर्यादा नहीं रखते आज के रावण, कानून क्या, ईश्वर से भी नहीं डरते आज के रावण। मारीच के जैसे स्वांग रचाकर जग में घूमते रहते ये, रक्तबीज जैसे हैं, मारे से नहीं मरते आज के रावण। शूर्पणखा की नाक से भी बड़ी है इनकी कामवासना, हर रोज एक नई सीता को हैं […]

कविता

कविता- सिर्फ तेरे लिए

जिए जा रहे हैं उसके लिए कैसे मानलें वो अब नहीं ये फ़िज़ाएं, लहराती हवाएं करवट बदल खिलती कलियाँ बार-बार अहसास कराती हैं जी रही है वो भी मेरे लिए वो है, यही है मुझ में ही इतराती हुई, शर्माती हुई घुँघरू पहन नाचती हुई कानों में आकर कहती है मैं यहीं हूँ सिर्फ तुम्हारे […]

कविता

कविता

मुझे मुझसे मिलने दो खुद से उलझकर फ़िर सुलझने दो कोई रोक नहीं पायेगा जब भरुंगी लंबी उडान खुद का सहारा बनकर नये पंख लगने दो ये जो काले बादल घुमड घुमड़ करके आ गये इनके पीछे छुपा आसमानी एक जहां मुझे बुलाता है नूतन तुम हो यहीं हो यहीं कहीं, चारों ओर मिलो तो […]

कविता ब्लॉग/परिचर्चा लेख

कविता : जो खुद को सेक्युलर नहीं मानते उनके लिए

बाहर हैं तो अभी सीधा घर जाइये घर जाकर टी.वी. में आग लगाइये सभी जाति -धर्म के लोग दिखाई देगें फिल्म – सीरियल पर नजर दौड़ाइये बच्चों को उस स्कूल में डालिये जहां आपकी जाति के शिक्षक होने चाहिये सामान हर दुकान से मत खरीदिये दुकान भी आपकी जाति धर्म की होनी चाहिए किस धर्म […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य : टॉयलेट से ताजमहल तक 

हमारी सरकार टॉयलेट बनाने पर आमादा है। यूं कहे कि सरकार ने टॉयलेट बनाने का ठेका ले रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां जाते है, वहां शुरू हो जाते है – भाईयों और बहनों और मित्रों ! टॉयलेट बनाया कि नहीं ? ”शौच है वहां सोच है“ सरकार का जब ध्येय होगा तो एक दिन […]

सामाजिक

लेख– फ़िर बचपन सुरक्षित है कहाँ?

देश की लोकतांत्रिक राजनीति गाहे-बगाहे किसानों, और अन्य लोगों की चर्चा कर लेती है। भले आखिरी में परिणाम वहीं हो, वहीं ढाक के तीन पात। ऐसे में पहला ज्वलन्त सवाल यही, क्या राजनीति ने कभी देश के भावी भविष्य को याद करने की भूल की? उत्तर नहीं है किसी के पास। ऐसे में सवालों की […]

सामाजिक

लेख– कैसे समाज का निर्माण कर रहें हम?

सभ्य समाज में व्यक्ति का महत्व होना चाहिए, उसके जाति का नहीं। हमारी युवा पीढ़ी को यह बात अपने ह्रदय में उतारनी होगी। भेदभाव और सामाजिक वैमनस्यता का दुष्परिणाम समाज और देश ने किस क़दर उठाया। वह किसी से छिप नहीं सका। फ़िर ऐसे में कुछ सवाल ज्वलंत रूप से खड़े होते हैं, कि देश […]

गीत/नवगीत

“भक्तों के अधिकार में”

बात करते हैं हम पत्थरों से सदा, हम बसे हैं पहाड़ों के परिवार में। प्यार करते हैं हम पत्थरों से सदा, ये तो शामिल हमारे हैं संसार में।। देवता हैं यही, ये ही भगवान हैं, सभ्यता से भरी एक पहचान हैं, हमने इनको सजाया है घर-द्वार में। ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।। दर्द […]

लघुकथा

लघुकथा – आक थू….

रात के दस बज रहे थे | अनुपम का विदेशीनस्लीय कुत्ता बड़े जोर- जोर से भौंक रहा था, शायद घर में हो रहे शोर – शराबे व अनजान चेहरों के जमाबडे को देखकर वो ऐसा कर रहा था | अनुपम की शादी की यह पॉच वीं सालगिरह पार्टी थी, मेहमानों के साथ पीने – पिलाने […]

लघुकथा

मदद की हकदार

असलम बैंक से वापस आ रहा था । खाते में व्याज के रूप में मिली रकम लगभग नौ सौ रुपये उसने नगद निकलवा लिया था । ये वो रकम थी जो उसकी धार्मिक मान्यता के अनुसार ‘ हराम ‘ की थी । यह रकम वह खुद के लिए नहीं खर्च कर सकता था । इसे […]