Monthly Archives: October 2017



  • शुक्रिया मेरी कलम

    शुक्रिया मेरी कलम

    जब मैं छोटी थी बच्ची थी चोक से सिलेट पर लिखा करती थी कभी पेंसिल से लिख रब़र से मिटाया करती थी कभी स्केच से रंगीन चित्रों को सजाया  करती थी जब कलम मेरे हाथ आई...

  • कविता : पीड़ा

    कविता : पीड़ा

    ये पीड़ा वो पीड़ा जाने कितनी पीड़ाओं में व्यक्तित्व दबा है! देह पीड़ा में रोगों की छाया से शरीर कुंद हुआ मन पीड़ा में ह्रदय धात हुआ अंर्तमन अंत:पीड़ा में अवचेतन शून्य हुआ समाजिक पीड़ा में...


  • आरक्षण

    आरक्षण

    सिंहों की खातिर पिंजड़े है ,श्वानों को सिंहासन मिलता । मिल रहे कैक्टस को गमले, कीचड़ के बीच कमल खिलता । होते अयोग्य हर दिन पदस्थ ,मेधावी भटक रहे दर दर । यह कैसी उल्टी गंगा...

  • दोषी कौन ?

    दोषी कौन ?

    एम्बुलेंस सायरन की तेज आवाज के साथ एक मोड़ लेकर मुख्य सड़क पर दाखिल हुई । एम्बुलेंस में वेंटिलेटर पर अपनी जिंदगी के लिए मौत से जूझती एक क्षीण काया है और साथ ही बैठे हैं...


  • बढ़ते जाएँगे

    बढ़ते जाएँगे

    भाग्य और पुरुषार्थ का मिल जाए हमें संग       हम बढ़ते ही जाएँगे लेकर मन में नई उमंग ऊर्जावान तरंगों की गति ले कदम बढ़ाएँगे राह के काँटों को हम कुचलते ही जाएँगे राह...

  • गज़ल

    गज़ल

    कभी लड़खड़ाते, कभी गिरते-पड़ते, कहां आ गए हम यूँ ही चलते-चलते, ======================= चलो लौट चलते हैं फिर बचपने में, कहा ख्वाहिशों ने मचलते-मचलते, ======================= वो सपने जो थे रात भर साथ मेरे, कहीं खो गए दिन...