त्रिपुरा के पर्यटन स्थल

त्रिपुरा पूर्वोत्तर का छोटा पर सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है I  त्रिपुरा नाम के संबंध में विद्वानों में मत भिन्‍नता है । इसकी उत्‍पत्‍ति के संबंध में अनेक मिथक और आख्‍यान प्रचलित हैं । कहा जाता है कि राधाकिशोरपुर की देवी त्रिपुर सुंदरी के नाम पर त्रिपुरा  का नामकरण हुआ । एक अन्‍य मत है कि तीन नगरों की भूमि होने के कारण त्रिपुरा नाम दिया गया । विद्वानों के एक वर्ग की मान्‍यता है कि मिथकीय सम्राट त्रिपुर का राज्य होने के कारण इसे त्रिपुरा अभिधान दिया गया । कुछ विद्वानों का अभिमत है कि दो जनजातीय शब्‍द ‘तुई’ और ‘प्रा’ के संयोग से यह नाम प्रकाश में आया जिसका शाब्‍दिक अर्थ है ‘भूमि और जल का मिलन स्थल’ । त्रिपुरा एक प्राचीन हिन्दू राज्य था और 15 अक्टूबर 1949 को भारत संघ में विलय से पहले 1300 वर्षों तक यहाँ महाराजा शासन करते थे I राज्यों का पुनर्गठन होने पर 01 सितम्बर 1956 को त्रिपुरा को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया I 21 जनवरी 1972 को इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया I लगभग 18 आदिवासी समूह त्रिपुरा के समाज को वैविध्‍यपूर्ण बनाते हैं जिनमें प्रमुख हैं- त्रिपुरी, रियड; नोआतिया, जमातिया, चकमा, हालाम, मग, कुकी, गारो, लुशाई इत्‍यादि । इस प्रदेश के पास उन्नत सांस्‍कृतिक विरासत, समृद्ध परंपरा, लोक उत्‍सव और लोकरंगों का अद्धितीय भंडार है । बंगला और काकबराक इस प्रदेश की प्रमुख भाषाएं है । हिंदी भी व्यापक रूप से यहाँ बोली जाती है I इसका क्षेत्रफल 10486.00 वर्गकिलोमीटर तथा कुल जनसंख्या 3,671,032 है जिनमे 1,871,867 पुरुष एवं 1,799,165 महिला हैं I जनसंख्या का घनत्व 350 प्रति वर्गकिलोमीटर और लिंग अनुपात ( प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या ) 961 है I त्रिपुरा में साक्षरता 87.75 प्रतिशत है I राज्य के प्रमुख शहर अगरतला, अमरपुर, अम्बासा, धर्मनगर, आनंदनगर, बेलोनिया, कैलाशहर, उदयपुर, विशालगढ इत्यादि है I त्रिपुरा में अनेक पौराणिक व ऐतिहासिक स्थल हैं जो पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं I

अगरतला – अगरतला त्रिपुरा की राजधानी है I यह गुवाहाटी के बाद पूर्वोत्तर भारत का दूसरा सबसे बड़ा शहर है I ‘अगरतला’ दो शब्दों ‘अगर’ और ‘तला’ के संयोग से बना है I ‘अगर’ का अर्थ है ‘एक मूल्यवान सुगन्धित वृक्ष’ और ‘तला’ का अर्थ है ‘भंडार गृह’ I इस प्रकार अगरतला का अर्थ है सुगंधित पेड़-पौधों के बाहुल्य वाला स्थान I अगरतला हावरा नदी के तट पर बांग्लादेश की सीमा पर अवस्थित है I यह शहर 76.504 वर्ग किलोमीटर में फैला है I अगरतला का स्वर्णिम अतीत पर्यटकों को आकर्षित करता है I  ‘अगर’ वृक्ष का वर्णन महान राजा रघु के संदर्भ में बार- बार आता है जो लोहित नदी के तट पर स्थित अगर वृक्ष  में अपने हाथी के पैरों को  बांधते थे । ईसा पूर्व 1900 में अगरतला के आरंभिक राजाओं में पतरदन की चर्चा मिलती है I चित्ररथ, दृकपति, धर्मफा, लोकनाथ जीवनधरण अगरतला के महत्वपूर्ण राजा थे। अगरतला के लिए गुवाहाटी, कोलकाता और दिल्ली से हवाई सेवा उपलब्ध है I अगरतला के लिए गुवाहाटी से प्रतिदिन ट्रेन चलती है I यह शहर सड़क से भी अच्छी तरह जुड़ा हुआ है I अगरतला गुवाहाटी से 587 किलोमीटर, कोलकाता से 1645 किलोमीटर, शिलोंग से 487 किलोमीटर, सिलचर से 250 किलोमीटर और बांग्लादेश की राजधानी ढाका से मात्र 150 किलोमीटर दूर है I

त्रिपुरा राज्य संग्रहालय- त्रिपुरा राज्य संग्रहालय दुर्लभ कलाकृतियों और पांडुलिपियों का भंडार है जो पूर्वोत्तर के समृद्ध इतिहास पर रोशनी डालता है। वास्तव में यह संग्रहालय राज्य की सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न अंग है। इस संग्रहालय का राज्य स्तरीय संग्रहालय के रूप में 22 जून 1970 को उद्घाटन किया गया था। यह संग्रहालय राज्य के अनमोल धरोहरों का  भंडार घर है जो त्रिपुरा की उत्कृष्ट कला और शिल्प का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। अगरतला शहर में चौमोहानी डाकघर के निकट स्थित इस संग्रहालय में चार दीर्घा है:  पुरातत्व गैलरी, आदिवासी संस्कृति गैलरी, चित्रकारी गैलरी और भारतीय मूर्तिकला गैलरी I इन दीर्घाओं में 1645 से अधिक ऐतिहासिक यादगारों के अद्भुत संग्रह को प्रदर्शित किया गया है। विद्वान और इतिहासकार इन सोने, चांदी और तांबे के सिक्कों के माध्यम से ऐतिहासिक साक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। यहाँ अनेक बर्तन, मिट्टी, कांस्य की मूर्तियां और ताम्र शिलालेख हैं I संग्रहालय के अभिलेखागार में कुछ क़ीमती पांडुलिपियों में बंगला और संस्कृत महाकाव्य का इतिहास शामिल हैं। संग्रहालय में एक समृद्ध पुस्तकालय भी है जिसमें त्रिपुरा के इतिहास, पुरातत्व, वास्तुकला और नृविज्ञान पर केन्द्रित दुर्लभ पुस्तकें उपलब्ध हैं I

हेरिटेज पार्क – बारह एकड़ भूमि में फैले हेरिटेज पार्क शहर के केंद्र में स्थित है जो राजभवन के उत्तर में अगरतला-जीबीपी अस्पताल रोड पर स्थित है। इस पार्क का उद्घाटन 30 नवंबर 2012 को त्रिपुरा के माननीय मुख्यमंत्री द्वारा किया गया था । पार्क के प्रवेश द्वार पर आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया गया है ।

उजयंत पैलेस – यह अगरतला शहर के बीच में स्थित है I यह पैलेस दो मंजिला हवेली है जिसमे तीन गुंबद है I इस राजमहल का निर्माण कार्य 1899 में आरंभ हुआ और 1901 में पूरा हुआ I इस पर दस लाख रुपए खर्च हुए थे I इसके दोनों तरफ दो बड़े तालाब और बीच में रास्ता है I इसमें मुग़ल स्थापत्य कला की तर्ज पर बगीचा, जलमार्ग एवं फव्वारे हैं I पैलेस का मुख्य भाग लगभग 80 एकड़ में फैला है I इस भाग में सिंहासन कक्ष, दरबार हॉल, पुस्तकालय, अध्ययन कक्ष और स्वागत कक्ष है जो कलाकृतियों से सुसज्जित है I स्वेत महल, लालमहल और दावतखाना का निर्माण बाद के वर्षों में किया गया I इस पैलेस में अब त्रिपुरा सरकार की विधानसभा एवं कुछ अन्य कार्यालय स्थित हैं I नदी किनारे बसे हुये उज्जयंत महल की खूबसूरती देखते ही बनती है। यह महल भारतीय-अरबी स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। इसके विशालकाय गुम्बद तथा लम्बे-लम्बे बरामदे, नक्काशीदार दरवाजे तथा फव्वारे किसी का भी मन मोह लेते हैं । यह महल 1947 तक अगरतला पर राज करने वाले माणिक्य राजवंश का आवास था। महल के एक भाग में आज भी उनके वंशज रहते हैं। महल में हाथी दांत से बना विख्यात राज सिंहासन भी है। इसमें एक संग्रहालय भी स्थापित किया गया है।

कुंजवन पैलेस – उज्यंत पैलेस के उत्तर में एक खूबसूरत पहाड़ी है जिसे कुंजवन के नाम से जानते हैं I यहाँ कलाविद महाराज वीरेंद्रकिशोर माणिक्य ने पैलेस एवं बगीचे की रुपरेखा बनायीं थी I यह महल महाराजा और उनके अतिथियों का विश्राम स्थल था I त्रिपुरा की सातवीं यात्रा के दौरान वर्ष 1926 में रवीन्द्रनाथ टैगोर इस महल के पूर्वी खंड में ठहरे थे I अब यह पैलेस राज्यपाल का निवास है I

जगन्नाथ मंदिर – जगन्नाथ मंदिर कुंजवन पैलेस के निकट स्थित है I जगन्नाथ मंदिर अपने अनूठे स्थापत्य के लिए विख्यात है I यह हिन्दू पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है I इसका आधार अष्टभुजाकार है जिसके चारों ओर एक प्रदक्षिणा पथ है I अष्टभुजा के प्रत्येक खम्भे पर वर्गाकार पिरामिड बना है I  जगन्नाथ मंदिर का वास्तुशिल्प दक्षिण भारतीय मंदिरों से प्रेरित है। शहर से 14 किलोमीटर दूर पुराने अगरतला में चतुर्दश देवता मंदिर स्थित है । यहां 14 देवियों की पूजा होती है। त्रिपुरी भाषा में इन देवियों के नाम हैं- लाम्प्रा, अखत्रा, बिखत्रा, बुरासा, थुमनाईरोक, बोनीरोक, संग्रोमा, मवताईकोतोर, त्विमा, सोंग्राम, नोकसुमवताई, माइलूमा, खुलूमा और स्वकलमवताई ।

तीर्थमुख- यह अगरतला से 117 किलोमीटर दूर अमरपुर अनुमंडल में स्थित है I यह गोमती नदी के उद्गम स्थल डाम्बूर जल प्रपात के निकट अवस्थित है I यहाँ हर वर्ष संक्रांति के अवसर पर हजारों हिन्दू श्रद्धालु धार्मिक स्नान करने के लिए आते हैं I इस अवसर पर एक मेला भी लगता है I यहाँ एक जलविद्युत उत्पादन संयंत्र स्थापित किया गया है I इसका जलाशय 40 वर्गकिलोमीटर में फैला है जिसमे छोटे- छोटे द्वीप हैं I चांदनी रात में झील की सैर अत्यंत मनोहारी होता है I

सुकांत अकादमी– यह एक विज्ञान संग्रहालय है जो अगरतला शहर के केंद्र में स्थित है । छात्रों, शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए परिसर में एक छोटा तारामंडल भी  स्थापित किया गया है। अगरतला स्थित चिल्ड्रेन पार्क में बच्चों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से विज्ञान, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से त्रिपुरा सरकार ने सुकांत अकादमी का विकास किया है।

ब्रह्मकुंड- यह अगरतला से 48 किलोमीटर दूर सिमना के रास्ते में स्थित है I यहाँ स्थित शिवमंदिर और तालाब पर्यटकों के आकर्षण के प्रमुख केंद्र हैं I यहाँ वर्ष में दो बार अप्रैल एवं नवंबर में मेला लगता है I ब्रह्मकुंड जाने के रास्ते में दोनों ओर चाय के बागान पर्यटकों की यात्रा को आनंददायक बनाते हैं I त्रिपुरा के पर्यटन मानचित्र पर ब्रह्मकुंड ने अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है I

त्रिपुरसुंदरी मंदिर– उदयपुर अगरतला से 55 किलोमीटर की दूरी पर गोमती नदी के किनारे स्थित है। इसे राज्य का तीसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता है। उदयपुर का दूसरा नाम झील सिटी भी है। शहर के प्रमुख आकर्षण पुराने महल, नज़रूल ग्रन्थागार, भुवनेश्वरी मंदिर, त्रिपुरसुंदरी मंदिर, गुणवती मंदिर समूह, कल्याण सागर हैं । उदयपुर में स्थित त्रिपुरेश्वरी मंदिर देश की 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसे कूर्म पीठ कहा जाता है क्योंकि मंदिर का आकार कछुए के समान है । इस मंदिर का निर्माण 1501 में महाराजा धन्य माणिक्य ने करवाया था I एक बार बिजली गिरने से मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया था तो महाराजा राम माणिक्य ने 1681 में इसकी मरम्मत करवायी थी I राधाकिशोर माणिक्य ने भी वर्तमान शताब्दी के आरम्भ में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था I त्रिपुरेश्वरी राज परिवार की कुलदेवी हैं I इसे माताबाड़ी भी कहते हैं I यहाँ दीपावली के अवसर पर भव्य मेला लगता है I उदयपुर के आसपास कुछ अन्य मंदिरों के खंडहर भी देखे जा सकते हैं I इसमें भुवनेश्वरी मंदिर, गुणवती मंदिर, दतिया समूह के मंदिर और गोविंद माणिक्य महल प्रमुख हैं I इनमे से अधिकांश मंदिरों का निर्माण 16 वीं और 17 वीं शताब्दी में हुआ है I मंदिर के निर्माण काल को लेकर विद्वानों में मतभेद है I मंदिर पर खुदे अभिलेख के अनुसार 1661 में इस मंदिर का निर्माण कराकर महाराजा गोविंद माणिक्य ने इसे भगवान विष्णु को समर्पित कर दिया था I दूसरे मत के अनुसार इसका निर्माण महाराजा विजय माणिक्य (1529 -60) के शासनकाल में हुआ था I गोमती नदी के दाहिने तट पर गोविंद माणिक्य का महल और भुवनेश्वरी मंदिर का खंडहर है I उदयपुर में ही गुणवती मंदिर स्थित है जिसका नामकरण गोविंद माणिक्य की पत्नी गुणवती के नाम पर किया गया है I

भुवनेश्वरी मंदिर – भुवनेश्वरी मंदिर उदयपुर का प्राचीन मंदिर है । 17 वीं सदी में निर्मित यह मंदिर गोमती नदी के तट पर पुराने शाही महल के निकट है। यह महल अब खंडहर में बदल गया है। महान लेखक रबीन्द्रनाथ टैगोर भी इस शक्तिपीठ से काफी प्रभावित थे। उन्होंने अपने उपन्यास तथा नाटक में इसका वर्णन किया है।

धर्मनगर– यह त्रिपुरा का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। राज्य की राजधानी की तरह धर्मनगर भी अपने समृद्ध इतिहास के लिए जाना जाता है। प्राचीन स्थल इस शहर की कहानी का बयान करते हैं । रोवा वन्यजीव अभयारण्य, अफलांग, जाम्पुई हिल्स और कालीबारी मंदिर इस शहर के प्रमुख आकर्षण हैं।

अम्बासा – यह त्रिपुरा के सबसे सुंदर शहरों में से एक है I यह शहर उल्लेखनीय मंदिरों की वजह से ध्यान आकर्षित करता है। इस शहर के प्रमुख आकर्षण हैं – कमलासागर काली मंदिर, गोमती वन्यजीव अभयारण्य, पिलक, कमलेश्वरी मंदिर, डुम्बोर झील आदि । कमलासागर काली मंदिर को  कस्बा काली बारी के रूप में भी जाना जाता है I कमलासागर काली मंदिर अगरतला से लगभग 27 किलोमीटर दूर स्थित है। यह बांग्लादेश की सीमा पर स्थित है और त्रिपुरा के सबसे लोकप्रिय पिकनिक स्थलों में से एक है। मंदिर में रखे देवता की प्रतिमा महिषासुरमर्दनी जैसी दिखती है I

ऊनाकोटि – उत्तरी त्रिपुरा में अवस्थित ऊनाकोटि पर्वतमाला देशी- विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र है I यह अगरतला से 177 किमी दूर कैलाशहर अनुमंडल के निकट स्थित है I यहाँ शिला पर उकेरे गए विभिन्न देवी – देवताओं के चित्र एवं भगवान शिव, गणेश, माँ दुर्गा, नंदी बैल की पत्थर की मूर्तियाँ देखने लायक हैं I यहाँ पर शिव और विशालकाय गणेश की मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है I शिव के सिर को उन्नकोटिश्वर काल भैरव कहा जाता है I जमीन में आधी धंसी नंदी की तीन बड़ी मूर्तियाँ हैं I केन्द्रीय शिव के आस –पास देवी की दो मूर्तियाँ हैं I पहाड़ी पर विष्णु पंचमुख, रावण, नरसिम्हा, गणेश और हनुमान की मूर्ति है I पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि ये मूर्तियाँ 11- 12 वीं शताब्दी की बनी हैं I यहाँ पर वसंत ऋतु में अशोक अष्टमी मेला लगता है I

नीरमहल -अगरतला से 52 किलोमीटर दूर स्थित नीरमहल अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है I इस महल के चारों तरफ रुद्रसागर झील है I ऐसी मान्यता है कि वीर विक्रम किशोर माणिक्य ( 1927 – 47 ) झील के सौन्दर्य से इस कदर अभिभूत हो गए कि झील के मध्य में उन्होंने महल बनवा दिया और उसे नीरमहल नाम दे दिया I यह महल अब जर्जर हो चुका है I इस महल का जीर्णोद्धार कर एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है I

गुमती वन्यजीव अभयारण्य – गुमती वन्यजीव अभयारण्य त्रिपुरा का प्रसिद्ध वन्यजीव अभयारण्य है जो राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित है। यह अभयारण्य में 389.59 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है । यह अभयारण्य मुख्य रूप से हाथी, भौंकनेवाले हिरण, सांभर, बाइसन के लिए प्रसिद्ध है I यहाँ घरेलू के साथ-साथ विविध प्रजातियों के प्रवासी पशु – पक्षी भी पाए जाते हैं I

रोवा वन्यजीव अभयारण्य– त्रिपुरा के उत्तरी किनारे पर स्थित रोवा वन्यजीव अभयारण्य राज्य का प्रमुख अभयारण्य है। यह छोटा अभयारण्य 85.85 वर्गकिलोमीटर में फैला है I इस अभयारण्य में विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीव और पेड़- पौधे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यह अभयारण्य वनस्पति विज्ञानियों, पक्षी विज्ञानियों और जीवविज्ञानियों के लिए प्रमुख गंतव्य है । यह अभयारण्य औषधीय जड़ी-बूटियों और ऑर्किड के लिए भी प्रसिद्ध है।

सिपाहीजाला वन्यजीव अभयारण्य– अगरतला से 35 किमी की दूरी पर सिपाहीजाला वन्यजीव अभयारण्य स्थित है। यह अभयारण्य एक आदर्श स्थल है जो त्रिपुरा की जैव विविधता को  संरक्षित करता है और राज्य में पर्यावरण पर्यटन को बढ़ावा देता है। सिपाहीजला वन्यजीव अभ्यारण्य 18.53 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है I त्रिपुरा की जैव विविधता को संरक्षित करने में इस अभयारण्य की महत्वपूर्ण भूमिका है I जनसंख्या वृद्धि के के कारण वन क्षेत्र सिमटता जा रहा है और जैव विविधता पर भी संकट बढ़ता जा रहा है । क्षेत्र की जैव विविधता को संरक्षित और प्रसारित करने के लिए वर्ष 1972 में सिपाहीजला जैव परिसर अस्तित्व में आया। एक बॉटनिकल गार्डन, एक हिरण पार्क और एक चिड़ियाघर भी इस वन्यजीव अभ्यारण्य के अंग हैं । अभयारण्य में पौधों की 456 से अधिक प्रजातियां, कई प्रकार के बांस और विभिन्न प्रकार की घास और औषधीय पौधे मौजूद हैं। नम और पर्णपाती जंगल में रेसस मकाक, पिग्टाइल मैकाक, कैप्ड लंगूर, स्पेकटेक्लेटेड बंदर और कई अन्य जंगली जानवर जैसे तेंदुए, क्लाउडेड तेंदुए, जंगली  मुर्गी, हिरण, जंगली सूअर आदि विभिन्न प्रजातियों का  निवास है । पर्यटकों के लिए अतिरिक्त आकर्षण का केंद्र कॉफी और रबड़ के बागान हैं I झील में नौकायन की सुविधा भी उपलब्ध है। अभयारण्य में कुछ आरामदायक पर्यटक कॉटेज हैं।

 

परिचय - वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम + पोस्ट- जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :-1.अरुणाचल का लोकजीवन(2003) 2. अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य(2009) 3.हिंदी सेवी संस्था कोश(2009) 4.राजभाषा विमर्श(2009) 5. कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय (2010) 7. हिंदी:राजभाषा,जनभाषा,विश्वभाषा (संपादन- 2013) सम्प्रति:- उपनिदेशक(राजभाषा),केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड(भारत सरकार) , भूजल भवन, एन एच- 4,फरीदाबाद- 121001, मोबाइल- 9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com