गज़ल

खाक होने दे बदन ये धूप में, साया ना कर,
हाल मेरा पूछकर वक्त अपना तू ज़ाया ना कर,
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गर छुपाना चाहता है दुश्मनों से राज़ सारे,
बात कोई दोस्तों को अपनी बतलाया ना कर,
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मैं सुधर जाऊँगा तो फिर कौन पूछेगा तुझे,
जैसा हूँ रहने दे मुझको ज्यादा समझाया ना कर,
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वक्त कितना भी हो मुश्किल बीत जाएगा ए दोस्त,
हौसला रख तू ज़रा सा इतना घबराया ना कर,
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उठ गए तो पलटकर रख देंगे हम सारा निज़ाम,
सोया ही रहने दे यूँ शेरों को उकसाया ना कर,
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नफरत मिली इतनी कि अब डरने लगा हूँ प्यार से
ज़ख्मों को मेरे नर्म हाथों से सहलाया ना कर,
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।