सामाजिक

लेख– पत्रकारिता अपने उद्देश्यों से भटक गई?

वर्तमान समय में पत्रकारिता अपने कर्तव्य, दायित्व और भूमिका से भटक चुकी है। पत्रकारिता की भूमिका संदेह के घेरे में पड़ गई है। एक बार माखनलाल चतुर्वेदी से जिला मजिस्ट्रेट मिओ मिथाइस ने पूछा कि एक अंग्रेजी वीकली के होते हुए भी आप हिंदी साप्ताहिक क्यों निकालना चाहते हैं, तब उन्होंने कहा कि आपका अंग्रेजी साप्ताहिक तो दब्बू है। मैं वैसा समाचार पत्र नहीं निकालना चाहता हूं। मैं एक ऐसा पत्र निकालना चाहूंगा, जिससे कि ब्रिटिश शासन चलता-चलता रूक जाए। क्या आज के दौर में पत्रकारिता में ये उद्देश्य कहीं तनिक भी दिख रहे हैं। कहा जाता है, कि किसी भी देश , समाज की दशा का वर्तमान इतिहास जानना हो, तो वहां के किसी सामयिक पत्र को उठाकर पढ़ लीजिए, वह स्पष्ट कर देगा, कि राष्ट्र किस दिशा की ओर बढ़ रहा है। अगर आज के दौर मे चरणगुलामी की पत्रकारिता दम भर रही है, फ़िर यह पत्रकारिता के नीति और महान पत्रकारों के विचारों के साथ अन्याय किया जा रहा है। संविधान में मीडिया को लोकतंत्र को चौथा स्तम्भ माना जाता है। इस लिहाज से मीडिया का समाज के प्रति उत्तरदायित्व और जिम्मदरियाँ बढ़ जाती हैं। मगर क्या वर्तमान वैश्विक दौर में जब कमाई का जरिया बनकर मीडिया रह गया है। वह समाज के प्रति अपने दायित्वों का सफल निर्वहन कर पा रहा है। उत्तर न में ही मिलेगा, क्योंकि लोकप्रियता का तमगा हासिल करने का जो बुखार हमारे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को लगा है। उसके साथ प्रिंट मीडिया के कुछ एक स्वामित्व ऐसे भी हैं, जो बाबाओं और सत्ता की चरणपादुका बन बैठे हैं। ऐसे में क्या देश मे पत्रकारिता की शुरुआत इसी उद्देश्य के लिए हुई थी? कि अपनी जेब भरने के लिए नेताओं और किसी ख़ास विचारधारा की चिलिम भरते रहो। आज के दौर में देश जाति, धर्म के फ़साने में फंसा हुआ है, उसकी जिम्मेदार पत्रकारिता भी है। जो समाज को उसका हक दिलाना भूलकर सत्ता की गोदी में बैठना जरूरी समझ रही है। आज समाज को अंधेरे में रखकर अपनी नजायज दुकान चलाने वालों की कमी नहीं है। तो उसकी गुनहगार हमारी लोकतांत्रिक मीडिया भी है। जो पैसों की सेज़ पर सोने की चाहत पालते हुए, राजनीतिक गोदी को ज़्यादा पसन्द कर रहीं है। आज का हमारा मीडिया लोगों को जागरूक करने की जगह भ्रमित करने का काम कर रहा है। लोकतंत्र के अन्य स्तंभों विधायिका ,न्यायपालिका , और कार्यपालिका के सभी क्रियाकलापों पर नजर रख कर मीडिया उन्हें भटकने से रोक सकता है , लेकिन विगत कुछ वर्षों से मीडिया सरकारों और संत-महात्माओं के चरणों में नतमस्तक हो चुका है।

पैसों की बढ़ती ललक, और अपनी टीआरपी के लिए मीडिया समाज को वास्तविकता दिखाने से कतराता है। मीडिया अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन जब वह बाबाओं के विज्ञापन और विज्ञापन के रूप में कार्यक्रम प्रसारित और प्रचारित करने लगे। फ़िर चंद सवाल उठते हैं। क्या मीडिया उसे मिली आजादी को पूरी जिम्मेदारी से जनहित के लिए निभा पा रही है ? क्या वह अपने कार्यकलापों में पूर्णतया ईमानदार है ? अगर ईमानदार है, तो फ़िर हमारी मीडिया भेड़- चाल चलने को विवश क्यों है। खबरों की प्रामाणिकता भी कोई विषय होता है, वह जल्दबाज़ी के चक्कर में क्यों खो जाता है? देश में पैसे लेकर खबर छापने की शर्मनाक प्रवृत्ति ने भी पत्रकारिता के मूल्यों और सिद्वांतों को छलनी करने का कार्य करने की सारी बंदिशें तो 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही पार कर चुका था। ऐसे में अगर पत्रकारों और पत्रकारिता से देश की आवाम का विश्वास टूटता जा रहा है, तो उसका एक बड़ा कारण पत्रकारिता का गिरता नैतिक मूल्य और पेड न्यूज की प्रवृत्ति भी है। जिस देश में अफवाहों के माध्यम से साम्प्रदायिक दंगे हो जाते हो , तोड़फोड़ की कार्यवाही कर सरकारी और निजी सम्पत्ति को क्षति पहुंचाई जाती है। उस देश में प्रेस की भूमिका काफ़ी बढ़ जाती है। अगर लोकतंत्र में प्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक दिया गया है, तो उसे अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्व से भटकना नहीं चाहिए। आज के दौर में चाहे प्रिंट मीडिया की बात हो, या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की जल्दबाजी और टीआरपी के फ़िक्र में भ्रमित और ग़लत ख़बरों को तथ्यों की बिना छानबीन के चला दिया जाता है, जो बाद में उसकी साख को भी कमजोर करता है। प्रेस किसी भी देश या समाज की वास्तविक स्थिति का प्रतिबिंब होता है। देश के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक फलक पर क्या कुछ घटित हो रहा है, इससे आमजन प्रेस के माध्यम से ही रूबरू हो पाते हैं। ऐसे में प्रेस के स्वतंत्र होने के साथ देश और समाज के प्रति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है, तभी प्रेस को लोकतंत्र में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था में चौथे स्तम्भ का दर्जा प्रदान किया गया है। लोकतंत्र की कुछ विशेषताएं होती है, जिनमें जनता का प्रतिनिधित्व, जनता के हितों का संरक्षण तथा जनता के प्रति उत्तरदायित्व। व्यवस्थापिका जनता का प्रतिनिधित्व करती है। किंतु कभी कभी जनता जागरूक न होने पर या दबाबवश कुछ ऐसा करने पर विवश हो जाती है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही ठेंगे पर नचाने का काम करती हैं। ऐसे में स्वस्थ लोकमत के निर्माण में प्रेस की भूमिका काफ़ी बढ़ जाती है। समाचार-पत्रों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य जनमत का निर्माण करना है। अगर जनमत अखबारों और न्यूज़ चैनल देखकर प्रभावित होता है, ऐसे में वह अगर गोदी बन बैठा। फ़िर जनतंत्र की जान सांसत में पड़ जाएगी।

आज के दौर में प्रेस जनमत के निर्माण की नहीं, बल्कि जनमत के भटकाव की प्रक्रिया को गतिशील बनाने में सहयोगी बन रहे हैं। पत्रकारों, राजनीतिज्ञों, अफसरों, उद्योगपतियों की चौकड़ी द्वारा जन-सामान्य के ध्यान को मूलभूत मुद्दों से हटाकर सतही समस्याओं पर केन्द्रित किया जा रहा है। प्रेस को अधिकार है कि वह प्रशासन की विफलताओं तथा भ्रष्ट अधिकारियों अथवा कर्मचारियों के काले कारनामों का पर्दाफाश करे। किंतु विज्ञापनों की चाह, प्रेस पर सरकार के बढ़ते स्वामित्व और प्रेस में बढ़ता कॉरपोरेट सेक्टर प्रेस की मूल भावना को क्षीण कर रहा है। यह आज के दौर का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है, कि आज़ादी के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जितना दुरूपयोग मीडिया द्वारा किया गया है, उतना किसी अन्य के द्वारा नहीं किया गया। अकबर इलाहाबादी ने कहा था- खींचों न कमानों को, न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। आज उस विचारधारा को आधुनिक मीडिया मंड़ियों ने तिलांजलि देना शुरू कर दिया है। जो एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक राष्ट्र के लिए उचित परिवेश नहीं कहा जा सकता है।  पत्रकारिता अधिकतम पारदर्शिता का पर्याय है, लेकिन  पेड न्यूज ने उसे गुफाओं के अज्ञात रहस्य में बदल दिया है। फ़िर कैसे माना जाए, समाज के अंतिम व्यक्ति तक सही, सटीक और निष्पक्ष खबरें पहुंच रहीं हैं। जो उनके सामाजिक, राजनीतिक, और आर्थिक विकास से जुड़ी हुई हो सकती हैं।

आज एक ही मीडिया घराने अखबार, चैनल, इन्टरनेट, रेडिया आदि सभी प्रकार के जनसंचार माध्यमों को चला रहें हैं, या फ़िर चलाने के लिए कदम बढ़ा रहें हैं, फ़िर विविधता और ख़बरों का एंगल अलग कैसे हो सकता है। जिससे समाज सही गलत को पहचान सके। आज के वक्त में पेड न्यूज की बढ़ती प्रवृत्ति लोकतंत्र को दीमक की भांति खोखला कर रही है। देश में पत्रकारिता की शुरूआत मात्र राजनीतिक दलों की प्रहरी बनने के लिए की गई थी? पत्रकारिता के उद्देश्य क्या होते है? इससे भटकना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कितना हानिकारक साबित हो सकता है? यह चंद सवाल है, जिस पर वर्तमान वैश्विक पत्रकारिता करने वालें घरानों को सोचना होगा। साथ ही राजनीतिक धृतराष्ट्रों के भी कुछ सामाजिक, नैतिक और संवैधानिक उत्तरदायित्व होते है। उसका उचित निवर्हन करने का जज्बा लोकतांत्रिक प्रहरियों में होना चाहिए। न कि जनता की आंखों में धूल झोंककर और सच्चाई को आईना दिखाने वाले कलम के सिपाहियों को खरीदकर आवाम को गुमराह करने का फित्तूर पालना चाहिए। मीडिया और लोकतंत्र के बीच गहरा सम्बंध है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। मीडिया का लोकतंत्र को मजबूत करने में महती योगदान रहता है। खासकर चुनावों में मीडिया से यह उम्मीद की जाती है कि वह जनता को सच्ची खबरें और विश्लेषण से रूबरू कराएगा। जिससे आवाम प्रभावित होकर स्वस्थ जनमत का निर्माण कर अच्छे लोगों को सत्ता की चौखट तक पहुंचाएगी, लेकिन जब मीडिया पेड न्यूज की शक़्ल में किसी गलत आचरण में लिप्त, गुंडे-मावली की छवि निर्मित करने का ठेकेदार बन गया। फ़िर यह शुभ संकेत मीडिया और लोकतंत्र दोनों के लिए नहीं। पिछले कुछ वर्षों से मीडिया में जो अधिग्रहण पूंजीपतियों का चल रहा है, वह लोकतन्त्र को बीमार बनाने के साथ स्ट्रेचर पर लिटाने की कोशिश है। जिससे सत्ता को अपने अंगुली पर नचाते हुए पूंजीपतियों की टोली अपने गोरख धंधे को बचाते हुए सत्ता पर पैर जमाना चाहती है। जो प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए घातक साबित हो सकती है। और जन की आवाज़ कहीं गुम हो रहीं है।

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896