मासूम (लघुकथा)

आज मासूम खुशी से फूला नहीं समा रहा था. सात साल में पहली बार कल उसका जन्मदिन इतने ज़ोरशोर से जो मना था. आज सुबह ममी ने उसे उसी तरह झप्पी देकर उठाया था, जैसे गुड़िया को उठाती हैं. आज पापा ने भी उसी तरह गुड मॉर्निंग का जवाब इतने प्यार से दिया था, कि वह निहाल हो गया. अभी वह बहुत ज़्यादा हर्षित नहीं होना चाहता था, कहीं उसकी किस्मत को फिर से नज़र न लग जाए, वह फिर से मासूम न बन जाए. इसी सोच में वह अतीत में खो गया.

न जाने किसने उसका नाम मासूम रख दिया था और वह कितनी बार मासूम बना था. उसकी भी प्यारी-सी मां थी, जिसने उसे जन्म दिया, पाला-पोसा, खाना-पीना-चलना-बोलना सिखाया. तीन साल बाद वह न जाने कौन सी दुनिया में चली गई! लोग कहने लगे- ‘मासूम बेचारा मासूम हो गया’. फिर पापा ने नई शादी की, तब भी लोग कहते थे- ‘बेचारे मासूम का क्या होगा!’ शुक्र है, नई मां अच्छी थी, उसने प्यार से उसे अपना लिया. एक दिन पापा इस दुनिया से विदा हो गए. एक बार फिर लोग कहने लगे- ‘बेचारे मासूम की किस्मत भी उसके नाम की तरह मासूम ही निकली!’ फिर आगमन हुआ नए पापा का. अब पापा भी सौतेले, मां भी सौतेली. मासूमियत को तो बढ़ना ही था! तभी आई घर में नन्ही-सी गुड़िया. स्वभावतः उसके लाड़-प्यार में मासूम को बेचारा तो बनना ही था.

तीन साल बाद इसी गुड़िया ने उसको मासूमियत के कूप से निकाला था. हर साल गुड़िया का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनता था. इस बार वह समझदार गुड़िया जिद्द पर अड़ गई- ”जिस तरह मेरा जन्मदिन ठाठ-बाठ से मनाया जाता है, भैय्या का भी मनना चाहिए.” गुड़िया की उसी जिद्द ने कल उसे इतनी खुशियां प्रदान की थीं, कि उसे लगा- ‘अब वह मासूम नहीं रहा’.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।