नज़रों की आवाजाही को ब्रेक

शादी सम्पन्न होने के बाद निशिता की विदाई होने वाली थी. दोनों परिवारों की अनुमति से यह प्रेम विवाह सुनियोजित विवाह की तरह सम्पन्न हुआ था. फिर भी विदाई की भावुक बेला ने निशिता और उसके मायके के पूरे परिवार को जहां अत्यंत भावुक कर दिया था, वहीं ससुराल वाले प्रसन्नता से निशिता की राहों में गुलाब के फूलों की पंखुड़ियां बिछाने में व्यस्त थे. गुलाब के फूलों की नाज़ुक पंखुड़ियों पर महावर से रंगे कदमों से निशिता विदा होकर ससुराल पहुंची. ससुराल में भी फूलों की सजावट थी. यहां गुलाब के फूलों की नाज़ुक पंखुड़ियां नहीं थीं, यहां तो पूरी सुहाग-सेज गेंदे के फूलों से सुसज्जित थी. निशिता को यह कुछ विचित्र-सा लगा. कुछ ही दिनों में सुहाग-सेज को गेंदे के फूलों से सुसज्जित करने का राज़ उसके सम्मुख खुलता हुआ-सा लगा, जब रोज़ सुबह कमरे से बाहर आने पर सबकी नज़र उसकी कोख की उर्वरता पर टिक जाती थी. आखिर गेंदे के फूल की प्रत्येक पंखुड़ी को सृजन का, उर्वरता का प्रतीक जो माना जाता है. नज़रों की यह आवाजाही पूरे पांच साल तक चली, जब तक निशिता ने पहली संतान को जन्म नहीं दे दिया. गेंदे के फूलों ने ससुराल की नज़रों की आवाजाही को ब्रेक लगा दी थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।