Monthly Archives: November 2017

  • पब्लिक अॉन डय़ूटी…

    पब्लिक अॉन डय़ूटी…

    बैंक में एक कुर्सी के सामने लंबी कतार लगी है। हालांकि बाबू अपनी सीट पर नहीं है। हर कोई घबराया नजर आ रहा है। हर हाथ में तरह – तरह के कागजों का पुलिंदा है। किसी...

  • मन का बोझ-

    मन का बोझ-

    अस्पताल के कॉरिडोर में स्ट्रेचर पर विवेक कराह रहा था | डॉक्टर से उसके जल्द इलाज की मिन्नतें करता हुआ एक अजनबी, बहुत देर तक डॉक्टरों और नर्सों के बीच फुटबॉल बना हुआ था। बड़ी मुश्किल...

  • आग हम अंदर लिए हैं

    आग हम अंदर लिए हैं

    वो किसी पाषाण युग के वास्ते अवसर लिए हैं । देखिये कुछ लोग अपने हाथ मे पत्थर लिए हैं ।। है उन्हें दरकार लाशों की चुनावों में कहीं से । अम्न के क़ातिल नए अंदाज में...


  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    उसकी खुशबू तमाम लाती है ।। जो हवा घर से उसके आती है ।। आज मौसम है खुश गवार बहुत । बे वफ़ा तेरी याद आती. है ।। कितनी मशहूर हो गई है वो । कुछ...





  • “पिरामिड”

    “पिरामिड”

    क्यों स्तब्ध हो गया नादान है उसे समझ वो उलझन है विस्मित्त करती है॥-1 जा हस्र देखना समझना परखना भी आश्चर्यचकित करती है ललना॥-2 महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी