Monthly Archives: November 2017

  • तुम_लिखो

    तुम_लिखो

    आँख को जाम लिखो ज़ुल्फ को बरसात लिखो, जिस से नाराज हो उस शख़्स की हर बात लिखो, जिस से मिलकर भी न मिलने की कसक बाकी है, उसी अंजान शहंशाह की मुलाकात लिखो, जिस्म मस्जिद...



  • गज़ल

    गज़ल

    मैंने नामुनकिन चिज़ों को मुनकिन हैं कह दिया यकीन ना था मुझे मगर मैंने यकीन है कह दिया पुनम का चाँद पुनम की रात से ख़फा है मुझ से मेरी महबुबा को मैंने ज्यादा हसीन है...

  • “मुक्त काव्य”

    “मुक्त काव्य”

    परिंदों का बसेरा होता है प्रतिदिन जो सबेरा होता है चहचाहती खूब डालियाँ हैं कहीं कोयल तो कहीं सपेरा होता है नित नया चितेरा होता है पलकों में घनेरा होता है परिंदों का बसेरा होता है...

  • खानाबदोश ज़िन्दगी

    खानाबदोश ज़िन्दगी

    पुरानी कॉलोनी के पार्क में वे दोस्तों के साथ खेल रहे थे कि मुझे देख सब छोड़-छाड़, अंजना और अंशु, दौड़कर मुझसे लिपट गए। दोनों को पता है, कुछ न कुछ तो मेरे पर्स में या...

  • जन्मदिन की ग़ज़ल

    जन्मदिन की ग़ज़ल

    भेजूँ जन्मदिन पर गजल उपहार , करूँ शुभकामनाओं का इजहार। हो आशाओं की मंजिल बुलंद , करे सारे सपनों को साकार । लबों पर छाए ऐसी मुस्कान , जैसे अपनों का बरसता प्यार । जीवन के...



  • सेल्फ मेड

    सेल्फ मेड

    “ये क्या लिख कर लाये हो अक्षत ? ऐसे उत्तर तो तुम्हें नहीं लिखवाये थे मैंने ।” शिक्षिका ने डांटते हुए कहा । ” जी …..मैम …..वो मैं बीमार जो रहा इतने दिनों से , मुझे...