शांतिप्रियों का शांति पाठ अब भारत में भी शुरू

शांतिप्रिय धर्म की जनसंख्या जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे ही शांति स्थापित होने का खतरा दुनिया पर मंडराता जा रहा है और भगवा को आतंकी सिद्ध करने का पुरजोर प्रयत्न किया जा रहा है। भारत भले ही रात दिन पाकिस्तान को अपनी दुर्दशा के लिए कोष रहा है मगर बिमारी बाहर नहीं अंदर है। यानी अब भारत को खतरा पाकिस्तान से नहीं भारत में पल रहे शांतिपिर्यों से ज्यादा है। जो हर रोज सेना सरकार और यहाँ के बहुसंखियक लोगों को चुनौती दे रहे हैं और दावा कर रहे हैं की ये देश राम का नहीं ख्वाजा का है और वो ख्याजा की औलाद हैं। अब ये भारत की बहुसंखियक आबादी के समझ से परे है कि सरकार जो सबका साथ सबके विकास कि बात कर रही है। क्या इनका विकास कर पाना संभव है जो देश के कानून सेना सरकार सब को ताक पर रख कर अपने कारनामों को अंजाम देने में बढ़-चढ़ कर खुलेआम एकत्रित हो रहे हैं और फसाद करने के लिए तैयार हैं। जब भी इनकी बारी आती है तो क्यों सरकार इनकी और से मुँह फेर लेती है और इन्हें भटके हुए नौजवान कहकर छोड़ देती है। जो पुरजोर से अपने मजहब को पूरी दुनिया में फ़ैलाने के लिए मार-काट तक कर रहे हैं और खुद भी मर जाने के लिए तैयार हैं वो सरकार को भटके हुए कैसे लगते हैं इन शांतिप्रिय लोगों कि आबादी जहाँ-जहाँ भी बढ़ती जा रही है वहां-वहां ही अन्य लोग घटते जा रहे हैं।
अब पाकिस्तान को कोषना बंद करे भारत क्योंकि अब बिमारी पाकिस्तान से चल कर भारत में महामारी का रूप धारण कर चुकी है और इस महामारी का इलाज शीघ्र ही प्रारम्भ करे नहीं तो ये महामारी फिर से भारत को खंडित कर देगी और फिर से किसी अन्य पाकिस्तान या बांग्लादेश का निर्माण कर लेगी।
अब राष्ट्र को बलिदान की आवश्यकता है। मां भारती दिन पे दिन लजित हो रही है। प्रतिदिन इसके रखवालों को पत्थर मारे जा रहे हैं। हर रोज इसके सपूतों को मौत के घाट उतारा जा रहा है। इसकी बर्बादी के सपने इसकी ही छाती पर बैठकर दुश्मन बुन रहे हैं और आप कहते हो सब ठीक है। हम दुश्मन को कड़ा जवाब देंगे। हम कड़ी निंदा करते हैं। अब कड़ी निंदा करने का वक्त खत्म हो चुका है।
मान्यवर राष्ट्र पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं और आप हमें सिर्फ दिलाशा दे रहे हैं। कड़ी निंदा करके हमें म्यंमार जैसे हालातों तक नहीं पहुंचना वैसे भी हम पहले ही बहुत युद्ध झेले हुए हैं। पहले ही मां भारती के कई टुकड़े करवा चुके हैं और हर उस टुकड़े पर केवल इस्लाम का ही हक हुआ है। अब हमने इतिहास से सीख लिखा है। यदि शांत रहेंगे तो ऐसे ही टुकड़ों में बटते रहेंगे और अपनी ही भूमि पर परवासी बन कर रहेंगे। हम दिन पे दिन सिमटते जा रहे हैं और दुश्मन बढ़ते जा रहे हैं। बस अब बहुत हो चुका।
 अब कड़ी निंदा खत्म करके ये लागू करो सभी सरकारी कर्मचारियों का मासिक वेतन आधा करो। क्योंकि 4 5 हजार रुपये कमाने वाला व्यक्ति भी अपने बच्चों को पालता है फिर सरकारी कर्मचारियों को लाखों देने की क्या जरूरत है राष्ट्र पर संकट मंडरा रहा है। राष्ट्र को अब सरकारी कर्मचारियों की नहीं सुरक्षाकर्मियों की आवश्यकता है और आप सरकारी कर्मचारियों को चांदी बांट रहे हैं। जब देश ही नहीं रहेगा तो सरकार और उसके नौकर क्या खाक करेंगे। उस धन से देश की सेना मैं भर्ती शुरू करो। युवाओं को स्वयं की एवं मां भारती की रक्षा करने के अवसर दो। बहुत बड़ी संख्या में हमारे पास बेरोजगार युवा हैं। जब प्रत्येक युवा सेना में होगा तो प्रत्येक युवा के हाथ में हथियार होगा और वो हमेशा मां भारती की रक्षा के लिए तत्पर रहेगा तथा देश में पल रहे शत्रुओं के सिर कुचलेगा। अब और शत्रुओं को उत्पात मचाने के अवसर मत दो। अब और शत्रुओं को देश के टुकड़े करने के अवसर मत दो। अब और शत्रुओं को तिरंगा फाड़ने राष्ट्रगान का अपमान करने पाकिस्तान के नारे लगाने आतंकवादी के मरने पर चिल्लाने सेना पर पत्थर मारने के अवसर मत दो। अब और कश्मीर मत बनने दो। अब और बंगलादेश मत बनने दो। रोको मां भारती की छाती पर पल रहे इन शत्रुओं को रोको। नहीं तो ये शीघ्र ही यहां भी म्यंमार बनाने वाले हैं। अब तक तो गाय खाते थे। फिर हिन्दू को खाने वाले हैं।
— डी. एस. पाल (लेखक)

परिचय - डी. एस. पाल

फिल्म राइटर्स एसोसिएशन मुंबई के नियमित सदस्य, हिन्दी उपन्यास "आतंक के विरुद्ध युद्ध" के लेखक, Touching Star Films दिल्ली में लेखक और गीतकार के रूप में कार्यरत,