किशोरावस्था से मुलाकात

मुझे समझ न आए बात, किशोरावस्था से मुलाकात
हुई कब रातों में, मैं खोई बातों-बातों में-

 

रहूं वैसे तो अपनों में
मगर खोई-सी सपनों में
दिवास्वप्न करें बेचैन, नहीं लेने देते हैं चैन
हुई कब रातों में, मैं खोई बातों-बातों में-

 

अचानक दर्पण से हुआ प्यार
निहारूं खुद को बारम्बार
करूं हरदम मैं यही विचार, कि आए मुझमें कैसे निखार
हुई कब रातों में, मैं खोई बातों-बातों में-

 

तनिक बदलाव हुए तन में
हुए कुछ परिवर्तन मन में
मुहांसे चेहरे पर आए, कुहांसा भावों पर छाए
हुई कब रातों में, मैं खोई बातों-बातों में-

 

कभी थी इच्छा मेले हों
सुहाए अब कि अकेले हों
शोर अब तनिक नहीं भाए, न कुछ भी मन को बहलाए
हुई कब रातों में, मैं खोई बातों-बातों में-

 

करूं मैं अपने से ही बात
न सुध हो कब हो दिन कब रात
डरी-सहमी देखूं हर ओर, कि जैसे मन में हो कोई चोर
हुई कब रातों में, मैं खोई बातों-बातों में-

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।