राहुल गाँधी की ताजपोशी

राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं और अब उनके सामने आनेवाले समय में कर्नाटक, मिज़ोरम और मेघालय में कांग्रेस को बचाने की ज़िम्मेदारी है. ऐसे में उनके सामने कई चुनौतियां हैं. उन्हें लगातार चुनाव में ख़राब प्रदर्शन कर रही पार्टी को जीतने वाली पार्टी में बदलना है साथ ही संगठन में अपनी छवि को भी एक नया रूप देना है. वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा का नज़रिया उन्हीं के शब्दों में : कठिनाइयां जब बहुत बढ़ जाती हैं तो जो इसे झेलने में जो सक्षम होता है वही अच्छा काम कर पाता है. मुश्किलों में कभी-कभी लीडरशिप उभरकर निकलती है. राहुल को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया. अब उन्हें जनता की अदालत में जाकर अपना केस जीतना है. यह किसी भी लीडर के लिए टेस्ट होता है. उनकी अध्यक्षता पर जनता की वही मुहर मानी जाएगी. राहुल गांधी को अपनी पार्टी को चुनाव में जीतने का हुनर अब सिखाना पड़ेगा और पार्टी में वो शक्ति लानी पड़ेगी कि वो चुनाव जीत सके. बीजेपी की तुलना में कांग्रेस पार्टी संस्था के तौर पर बहुत कमजोर नज़र आती है. यह गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान भी प्रत्यक्ष रूप से दिखा. जहां कांग्रेस और राहुल अच्छे से चुनाव लड़े. 18 तारीख़ को ही पता चल सकेगा कि राहुल के लिए आने वाले दिनों में चुनौतियां आखिरकार कितनी बड़ी हैं. ऐसा लगता था कि कांग्रेस संस्था के तौर पर तैयार नहीं है. अगर गुजरात में कांग्रेस की हार भी होती है, लेकिन वो हारने के बावजूद अच्छे आंकड़ों से अपनी इज़्ज़त बचा लेती है तो यह राहुल की अच्छी शुरुआत होगी. राहुल के लिए पार्टी को नया स्वरूप देना, नई शक्ति देना और ज़मीन पर ऐसे कार्यकर्ता बनाना जो भाजपा के कार्यकर्ताओं को मुकाबला दे सकें सबसे बड़ी चुनौती है. अपने 132 सालों के कांग्रेस के इतिहास में और खासकर आज़ादी के बाद कांग्रेस इतनी कमज़ोर कभी नहीं थी.

सोनिया गांधी जब 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बन कर आई थीं तब भी कांग्रेस बिखर रही थी, लेकिन उस समय भी संसद में ऐसी स्थिति नहीं थी. लिहाज़ा सोनिया के सामने इतनी बड़ी चुनौती नहीं थी. उन्होंने खुद ही कहा कि जब वो अध्यक्ष बनी थीं तब केवल तीन प्रांतों में कांग्रेस की सरकार थी और केंद्र की सत्ता से भी वो बाहर थी. लेकिन 1998 से लेकर 2004 तक कांग्रेस पार्टी केंद्र की सत्ता में आ गई. दूसरी बार भी यूपीए ने सरकार बनाई और साथ ही 21 प्रांतों में भी अपनी सरकार बना ली. क्या ये जादू राहुल गांधी दिखा सकेंगे? ये बड़ा प्रश्न है.

विज्ञान की भाषा में व्यक्तित्व परिवर्तन तो संभव नहीं है, लेकिन राजनीतिक तौर पर किसी राजनेता का नज़रिया तब बदलता है जब जनता को देखने का उसका अंदाज़ बदल जाता है. गुजरात में वो इसमें सफल हुए हैं. लोग उन्हें तन्मयता से सुनते थे. वो ऐसे मुद्दे पर बोलते थे जो लोगों के दिलों से जुड़े हुए थे. अपने प्रचार में वो जनता से जुड़े मुद्दे लगातार उठाते रहे. इसकी वजह से लोगों ने उन्हें एक नए नज़रिये से देखना शुरू कर दिया जो उनकी लीडरशिप की स्वीकृति जैसा है. अगर यह वोट में तब्दील हो जाए तो कांग्रेस के लिए अच्छा रहेगा. लेकिन अगर ये वोट में नहीं बदलता, लेकिन सीटें बढ़ती हैं तो भी आगामी चुनावों में पार्टी के मनोबल को बढ़ाएगा.

राजनीति का सिद्धांत है कि किसी भी पार्टी या राजनेता को ख़ारिज नहीं करना चाहिए. अटल बिहारी वाजपेयी 1984 में माधव राव सिंधिया से चुनाव हार गए. वो बाद में देश के प्रधानमंत्री बने. 2004 में चंद्रबाबू हारे, लेकिन 2014 में वो दोबारा जीत कर आ गए. क्या कोई ये सोचता था कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे. वो आज की तारीख़ में कई तबकों में सक्षम प्रधानमंत्री माने जाते हैं. किसी भी नेता को यह मान लेना कि वो ख़त्म हो गया है, ग़लत होता है.

बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी के पूर्व सहयोगी सुधींद्र कुलकर्णी ने शनिवार को नवनिर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत को उनके जैसे नेता की जरुरत है और वह देश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे। गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करने पर उनको बधाई देते हुए कुलकर्णी ने ट्वीट किया। गौरतलब है कि कुलकर्णी बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के काफी करीब रहे हैं। सुधींद्र कुलकर्णी बीजेपी से करीब 13 सालों तक जुड़े रहे थे। उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में आडवाणी के साथ काम किया था। उन्होंने ट्वीट किया, ‘आज मैं अधिक आश्वस्त हूं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी देश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे और उन्हें बनना भी चाहिए। एक नए नेता का उदय हुआ है। भारत को ऐसे नेता की जरुरत है।’ उन्होंने राहुल गांधी की सराहना करते हुए उन्हें वास्तव में गांधीवादी राजनीतिक विचार रखने वाला व्यक्ति बताया। कुलकर्णी ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी की भी प्रशंसा की और उन्हें साहसी महिला बताया। शनिवार को अध्यक्ष पद संभालने के बाद अपने पहले ही भाषण में राहुल गांधी ने बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला था। सुधींद्र कुलकर्णी ने 19 सालों तक कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिया गांधी की तारीफ करते हुए कहा, ‘सोनिया गांधी साहसिक महिला हैं। उन्होंने 19 साल पहले भंवर में फंसी कांग्रेस को उबारने में कामयाबी हासिल की। आज का उनका भाषण भी लाखों दिलों को छूने वाला था।’

गौरतलब है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने आखिरी संबोधन में शनिवार को कहा था, ‘1984 में इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। मुझे महसूस हुआ, जैसे मेरी मां मुझसे छीन ली गई। इस हादसे ने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल डाला। उन दिनों मैं राजनीति को एक अलग नजरिए से देखती थी। मैं अपने पति और बच्चों को इससे दूर रखना चाहती थी।’ पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, ‘इंदिराजी की हत्या के सात वर्ष बाद ही मेरे पति की भी हत्या कर दी गई। मेरा सहारा मुझसे छीन लिया गया। इसके कई साल बाद जब मुझे लगा कि कांग्रेस कमजोर हो रही है और सांप्रदायिक ताकतें उभर रही हैं तब मुझे पार्टी के आम कार्यकर्ताओं की पुकार सुनाई दी। मुझे महसूस हुआ कि इस जिम्मेदारी को नकारने से इंदिरा और राजीवजी की आत्मा को ठेस पहुंचेगी। इसलिए देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझते हुए मैं राजनीति में आई।’

जहाँ तक मेरा नजरिया है- राहुल गाँधी चाहते तो कब का कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी सम्हाल सकते थे. परदे के पीछे से राजनीती भी कर सकते थे. पर उन्होंने पहले खुद को तैयार किया, विकसित किया, तभी उन्होंने अध्यक्ष पद को सम्हालने की ईच्छा व्यक्त की और सोनिया गाँधी ने अपना उत्तराधिकारी उन्हें बना दिया, यह कहते हुए कि अब मै रिटायर हो रही हूँ. गुजरात चुनाव के दौरान उनका भाषण पहले की अपेक्षा काफी बेहतर रहा. वे सभ्यता और मर्यादा में रहते हुए प्रधान मंत्री पर एक से एक प्रहार किए. उन्होंने प्रधान मंत्री के सामने प्रश्नों की झड़ी लगा दी, जिसका जवाब देना भी प्रधान मंत्री ने उचित नहीं समझा. वे व्यक्तिगत हमले करते रहे और अपने ऊपर किये गए हमलों को अपनी ही शैली में भुनाते रहे. राहुल गाँधी ने अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में भी भाजपा पर हमले किये- उन्होंने कहा – वे नफ़रत फैलाते हैं, हम प्यार का वातावरण बनायेंगे. वे तोड़ते हैं, हम जोड़ते हैं. उनके व्यवहार में अभी जो शालीनता है वही आगे भी बनी रहनी चाहिए. संगठन को और मजबूत बनाना होगा. युवा नेतृत्त्व को बढ़ावा देना होगा और कार्यकर्ताओं की फ़ौज जमीनी स्तर तक तैयार करनी होगी जो जनता की समस्याओं को सुने और उन्हें दूर करने का हर संभव प्रयास करे. बिना फल और छाया की संभावना के कोई भी वृक्ष नहीं लगाता. वृक्ष वही जो हर आंधी-तूफ़ान का सामना करते हुए तन कर खड़ा रहे, पंछी को शरण दे और पंथी को छाया…

राहुल गाँधी को वंशवाद की बेल को हर मौसम की मार से बचाना है और एक नया नेतृत्व देना है. शासन में चाहे जो रहे पर एक मजबूत विपक्ष की भी अहम् भूमिका होती है, एक सफल लोकतन्त्र में. मोदी जी को जनता ने अभूतपूर्व बहुमत दिया है और वे बहुमत के आधार पर निर्णय भी ले रहे हैं. कोई कोई निर्णय एक बड़े वर्ग की जनता को पसंद नहीं आया. साथ ही देश में बेरोजगारी की समस्या नौजवान जूझ रहे हैं, किसानो की उपज का सही मूल्य नहीं मिल रहा. इसके अलावा आर्थिक पक्ष से भी देश की स्थिति अभी बहुत अच्छी नहीं है. इन सब पर मोदी सरकार को सोचना होगा और इन सब के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरूरी है.  जय लोकतंत्र! जय हिन्द!

  • जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.