गीतिका/ग़ज़ल

जब भी पीकर तुम आते हो (ग़ज़ल)

 

जब भी पीकर तुम आते हो।
हंगामा    ही    बरपाते   हो।

भूल नहीं पाए तुम अब तक।
खाबों  में  मिलने  आते  हो।

जज्ब  हुए  हो  ऐसे दिल में।
जख्म  हमारे   सहलाते  हो।

रूठी हूँ  मैं जब-जब  तुमसे।
नज़्म मेरे  दिल की गाते हो।

खुशियां तुम देने की खातिर।
चुपके  से गम  पी जाते  हो।

जब है मयस्सर तुम्हें मुहब्बत।
पैमाने   क्यूँ    छलकाते   हो।

दर्द  शिकायत  अक्सर लाये।
अब  के  देंखो  क्या लाते हो।

हिज्र कलेजा  फूंके “गुंजन”।
क्यूँ  तुम इतना  सुलगाते हो।

*अनहद गुंजन 21/12/17*

गुंजन अग्रवाल

नाम- गुंजन अग्रवाल साहित्यिक नाम - "अनहद" शिक्षा- बीएससी, एम.ए.(हिंदी) सचिव - महिला काव्य मंच फरीदाबाद इकाई संपादक - 'कालसाक्षी ' वेबपत्र पोर्टल विशेष - विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व साझा संकलनों में रचनाएं प्रकाशित ------ विस्तृत हूँ मैं नभ के जैसी, नभ को छूना पर बाकी है। काव्यसाधना की मैं प्यासी, काव्य कलम मेरी साकी है। मैं उड़ेल दूँ भाव सभी अरु, काव्य पियाला छलका जाऊँ। पीते पीते होश न खोना, सत्य अगर मैं दिखला पाऊँ। छ्न्द बहर अरकान सभी ये, रखती हूँ अपने तरकश में। किन्तु नही मैं रह पाती हूँ, सृजन करे कुछ अपने वश में। शब्द साधना कर लेखन में, बात हृदय की कह जाती हूँ। काव्य सहोदर काव्य मित्र है, अतः कवित्त दोहराती हूँ। ...... *अनहद गुंजन*