मुक्तक – सिक्के

हर दौर के सिक्के, सँभालकर रखता हूँ,
हो इतिहास की पडताल, ख्याल रखता हूँ।
बुजूर्गों ने बीते दौर का, इतिहास जिया है,
उनके विचारों से संस्कार, खँगालकर रखता हूँ।
अ कीर्तिवर्धन