तकनीकी गवाही

आरोप मुक्त सुभोमय ने आज चैन की सांस ली थी. उसके मन में अनेक विचार आलोड़ित हो रहे थे.

इस दुनिया में गुनाह भी होते रहते हैं, कुछ झूठे-कुछ सच्चे मामले भी दर्ज किए जाते रहते हैं, वादियों-प्रतिवादियों की पेशियां होती हैं, गवाहियां भी दी जाती हैं और गवाहियों के आधार पर गुनाही-बेगुनाही भी साबित की जाती रही है. कोलकाता के सुभोमय कपासी नाम के व्यापारी ने बचपन में अकबर-बीरबल की कहानी ”पेड़ ने दी गवाही” जरूर सुनी थी, लेकिन तकनीकी गवाही के बारे में उसने कभी नहीं सुना था, अलबत्ता उसने अपने कामगारों पर निगरानी रखने के लिए अपनी फैक्ट्रियों में सीसीटीवी जरूर लगा रखे थे. उसे पता नहीं था, कि एक दिन यही सीसीटीवी फुटेज उसकी बेगुनाही का सबूत बन जाएंगे.

उसकी एक फैक्ट्री में क्लर्क के रूप में कार्यरत एक महिला ने 4 साल पहले उस पर बलात्कार का आरोप लगाया था. अब बलात्कार होने की तिथि व वक्त बताना तो लाज़िमी था, सो बताना पड़ा. हां, पूरे चार साल तक यह मुकदमा चलता रहा. कोई वकील अपने मुवक्किल की बेगुनाही जुटा नहीं पाया.

अब सुभोमय को 4 साल बाद रिहाई मिल सकी. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज को खंगाला. जिस फैक्ट्री में आरोपी पर आरोप लगाया गया था, उस फैक्ट्री में तो आरोपी उस दिन उपस्थित ही नहीं थे. फिर दूसरी फैक्ट्री की सीसीटीवी फुटेज ने गवाही दी, कि वे उस फैक्ट्री में मौजूद थे. इस तकनीकी गवाही के आधार पर कोर्ट में फुटेज देखते ही जज ने उन्हें आरोप मुक्त कर दिया. कोर्ट से बाहर आकर सुभोमय ने कहा, ‘शुक्र है भगवान का जो मैंने सीसीटीवी लगवा रखे थे और ऐन वक्त पर संबंधित फुटेज पुलिस के हाथ लग पाई थी.’

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।