प्रतिभा की जीत

पुराने कागज़ों को खंगालते हुए आज सुनीता के हाथ में अपने पी.जी.टी. के साक्षात्कार के परिणाम की वह सूची आ गई, जिस पर चालीस साल पहले की तारीख अंकित थी और इस परिणाम में वह पूरे राज्य में प्रथम रही थी. वह आज भी उसी निर्विकारिता से उस सूची को देख रही थी, जैसी वह साक्षात्कार के दिन थी.

साक्षात्कार के लिए बुलाए जाने वाले पत्र में उसका नाम 415वें नं. पर लिखा था, फिर भी दस बजे बुलाए जाने पर वह दस बजे से पहले ही पहुंच गई थी और सबसे पीछे खड़ी थी. आसमानी रंग की कमीज़ पहने एक क्लर्क अपने हाथ में एक सूची लेकर कार्यालय के एक कक्ष से निकला था और सुनीता त्यागी, नं. 415 पुकार रहा था. 2-3 बार पुकारने पर सुनीता पीछे से आगे आई और उसे कह दिया गया, ”सबसे पहले आपको साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा, तैयार रहिएगा.

सभी अभ्यर्थियों में हड़कम्प मच गया था- ”मैडम कितने लाख रुपए का चढ़ावा चढ़ाया है आपने पहले नंबर पर साक्षात्कार देने के लिए?”

सुनीता निर्विकार रहकर सबकी ऐसी अनेक बातें सुनती रही. बाकी अभ्यर्थी भी उस सूची में अपना नाम देखकर खड़े होते जा रहे थे. खलबली जारी थी. शोर सुनकर आसमानी कमीज़ वाला फिर बाहर आया. इस बार उसके हाथ में साक्षात्कार के लिए नियत पैमाने की एक कॉपी थी. आप लोग शांति से बैठकर इनके प्रमाण पत्र देखकर इनकी अंक-तालिका बनाइए और अपनी अंक-तालिका से उसकी तुलना कीजिए. कुछ अभ्यर्थियों ने कोशिश की, पर नाकामयाब रहे. तभी एक अभ्यर्थी ने आगे आकर मोर्चा संभाल लिया. सुनीता के अंक सबसे अधिक ही बनते थे. सुनीता निर्विकार रही, बाकी सब शांत हो गए थे. यह चढ़ावे का नहीं, योग्यता और प्रतिभा की जीत थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।