सदाबहार काव्यालय-27

कविता
तू ज़ीरो बनके देख ज़रा

 

तू ज़ीरो बनके देख ज़रा
ज़ीरो को कहीं से भी देखो
ज़ीरो ही नज़र वो आता है,
ज़ीरो है ऐसा अंक जिसे
घटना-बढ़ना नहीं आता है,
तू उसकी महिमा समझ ज़रा
तू ज़ीरो बनके देख ज़रा.

 

लगे किसी अंक के दांएं
दस गुना उसे कर जाता है
यों तो उसका अस्तित्व नहीं
फिर भी वह मान बढ़ाता है
तू सोच-समझकर देख ज़रा
तू ज़ीरो बनके देख ज़रा.

 

तू लगे जो एक(प्रभु) के दांएं
रुतबा तेरा बढ़ जाएगा
लग जाए अगर तू बांएं
संसार से तू जुड़ जाएगा
तू दांएं लगकर देख ज़रा
तू ज़ीरो बनके देख ज़रा.

 

ज़ीरो बनने से डरता क्यों?
मरने से पहले मरता क्यों?
हीरो तो सब बनना चाहें
कुछ अलग-सा तू ना करता क्यों?
खुद को पहचान के देख ज़रा
तू ज़ीरो बनके देख ज़रा.

 

लीला तिवानी

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परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।