ग़ज़ल

मस्जिद दिखाई दे न शिवाला दिखाई दे ।
हर आदमी के दिल में उजाला दिखाई दे ।

चाहत का उसकी या खुदा कुछ ऐसा हो असर
हर शिम्त मुझको चाहने वाला दिखाई दे ।

मुझको पुकार लेना बड़े नाज़ से सनम

जब भी तुझे न कोई सहारा दिखाई दो।

बर्बाद करके खुद को भी मिलती है एक खुशी
है इश्क वो बला न दिवाला दिखाई दे।

खुशहाल इस तरह से हो हिन्द की धरा
मुफ़लिस के हाथ में भी निवाला दिखाई दे ।

— धर्म पांडेय