चेतावनी : जल की

जीवन-दाता मै कहलाता।
सब लोगों की प्यास बुझाता।
पर्वतों से मैं निकालता,
फिर सागर से मै मिल जाता।
सब पुछते है मुझसे
आखिर रंग मेरा कौन सा?
मैं कहता हूँ मेरा ढंग है नया-सा।
अमृत कहते हो तुम मुझे
जीने के लिए पीते हो।
मैं हूँ शीतल,
मैं हूँ चंचल,
मैं हूँ खुश-खुशाल।
मेरे आगे कोई नहीं टिकता
चाहे हो वो हिमालय का पहाड़।
मैं हूँ कोमल इतना
जैसे किसी बच्चे का हाथ।
आ जाता है मुझे गुस्सा
देखकर अपना हाल।
क्योंकि मैं हो चुका हूँ
बुरी तरह बेहाल।
सबने मिलकर बना दिया मुझे
विष का दूसरा नाम।
मन तो करता है मेरा
डुबो दू तुम सबकी जान।
मुझमें विष मिला कर
कब तक रहेगी तुम सब मे जान।
कभी न कभी होगा तुम्हें
अपनी गलती का अहसास।
इसीलिए कहता हूँ मैं इस इंसान से
वक्त है थोड़ा तुम्हारे पास
मिटा दो मेरे अंदर से
विष का नाम।
वरना नहीं बचोगे तुम भी
पीकर यह कड़वा विष का ग्लास।
— श्रीयांश गुप्ता

परिचय - श्रीयांश गुप्ता

पता : श्री बालाजी सिलेक्शन ई-24, वैस्ट ज्योति नगर, शाहदरा, दिल्ली - 110094 फोन नंबर : 9560712710