सदाबहार काव्यालय-37

चंद अशरात

 

ग़म मिलते गए सरे-राह, ख़ुशी की तलाश में
ग़म से किया किनारा, रास्ते ही खो गए
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इस लंबी ज़िन्दगी में ज़ायका बनाये हैं
तल्खियां भी ज़ुरूरी हैं, दिल में इन्हें सजाये हैं
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साथ हमसफ़र जो है तो चलने का है मज़ा
जो हमकदम खुदा हो, तो खुदी से हो पहचान
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जो खुद को खास कहते हैं, बड़े ही आम होते हैं
खुदा ही खास हैं, ऐसा अदीबों ने बताया है
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दर्द-ए-दिल से ही दुनिया में सारे काम होते हैं
गर ये नहीं तो दिल के उजाले भी बड़े नाकाम होते हैं
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हौसलों से ही तो ज़िन्दगी आसान होती है
इस रोशनी से ही दिलों में जान होती है
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(अदीब-गुणीजन)

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।