शेर और खरगोश

जंगल एक घना था जिसमें,
बब्बर शेर रहा करता था,
नित्य जानवरों को खाकर वह,
अपना पेट भरा करता था.

सभी दुःखी थे उसके डर से,
लगे सोचने कोई उपाय,
अपना-अपना राग अलापा,
अपने-अपने रखे सुझाव.

कोई भी जब बात न सूझी,
बोला छोटा-सा खरगोश,
मेरी भी है एक आरज़ू,
सुनकर सबको आया जोश.

बोलो-बोलो छोटे भैया,
तुम तो हो चालाक बड़े,
तुम्हीं सुझा सकते कुछ ऐसा,
शेर के होंगे कान खड़े.

”एक-एक जानवर बारी से,
जाएगा अब उसके पास,
इससे सबको डर न लगेगा,
सभी नहीं बैठेंगे उदास.

मरना इक दिन सबको ही है,
जीते जी क्यों सभी मरें?
कल मैं जाकर पास शेर के,
बारी दूंगा, धैर्य धरें”

सबने फिर से सोचा-समझा,
सबको अच्छी बात लगी,
बारी-बारी सब जाएंगे,
मौज करेंगे शेष सभी.

अगले दिन खरगोश मज़े से,
उछल-कूद करता आया,
बहुत देर से पहुंचा था वह,
भूख से व्याकुल शेर रहा.

शेर गरजकर बोला, ”वाह-वाह,
इतनी देर लगाई कैसे?
और अकेला छोटा-सा तू,
मेरी भूख मिटेगी कैसे?”

तनिक न घबराया वह नन्हा,
बोला, ”मिला इक शेर बड़ा,
सात-सात खरगोश निगलकर,
मुझको खाने झपट पड़ा.

कैसे बचकर आया हूं मैं,
स्वयं नहीं है मुझको होश,
यह गुस्से का समय नहीं है,
अभी चाहिए आपको जोश.

वरना रोज आपका खाना,
वह बेईमान चुरा लेगा,
भूखे आप मरेंगे राजन,
मजे लुटेरा वह लेगा”.

बोला शेर, ”कहां वह डाकू?
चलो मुझे तुम मिलवाओ,
आज करूंगा नाश चोर का,
जल्दी रस्ता दिखलाओ”.

एक कुएं के पास पहुंचकर,
बोला, ”इसमें रहता है.”
झांक कुएं में बोला, ”ठहरो,
मजा ठगी का मिलता है”.

‘आओ” बोला शेर तभी ही,
अंदर से ‘आओ’ गूंजा,
सोचा शेर ने शेर दूसरा,
गुस्से में ही है गरजा.

”अभी बताता हूं” कहकर वह,
कूद गया कुएं के अंदर,
”शेर मर गया, शेर मर गया”,
कहा सभी ने उछल-उछलकर.

ऐसी युक्ति से नन्हे ने,
किया सामना शेर बली का,
शेर मर गया, जान बच गई,
खरहा बन गया मीत सभी का.

खरहा= खरगोश

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।