गीतिका/ग़ज़ल

सुन रहा आसमां

वाचिक स्रग्विणी छंद ============= सुन रही है जमीं, सुन रहा आसमां। प्रेम की बात को, बुन रहा आसमां।। तुम चली हो किधर, आ जरा इस डगर। राह कांटे इधर, चुन रहा आसमां।। ना लडो इस समय, साथ मेरे चलो। देख बातें सभी, सुन रहा आसमां।। चांद की चांदनी में, गले आ मिलें। आज तो प्रेम […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ईश्वर मनुष्यादि प्राणियों के सभी शुभाशुभ कर्मों का द्रष्टा व फलप्रदाता है

ओ३म् यह समस्त दृश्यमान जगत ईश्वर ने बनाया है और वही इसका पालन कर रहा है। इस सृष्टि का इसकी अवधि पूरी होने पर प्रलय भी वही करता है। यह एक तथ्य है कि इससे पूर्व भी असंख्य बार सृजित हुई है व असंख्य बार ही इसका प्रलय भी हुआ है। यह सृष्टि ईश्वर ने […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मनुष्य को न अपने पूर्वजन्मों और न परजन्मों का ज्ञान है

ओ३म् मनुष्य अपने शरीर के हृदय स्थान में निवास करने वाली एक शाश्वत एव अल्पज्ञ चेतन आत्मा है। अल्पज्ञ जीवात्मा को माता, पिता, आचार्य की सहायता से ज्ञान अर्जित करना पड़ता है। इन साधनों से अर्जित ज्ञान को वह अनेकानेक ग्रन्थों के अध्ययन व स्वाध्याय तथा अपने विचार एवं चिन्तन से उन्नत करता है। इस […]

मुक्तक/दोहा

दोहे

१- गले मिलें हम भूलकर ,सारे कलुषित राग । बैर जला दें हम सभी ,हो होली की आग ।। २- मारें रंग फुहार की ,कर दें चूनर लाल। इस होली में रंग दें ,गोरी तेरे गाल ।। 3- मैं तुझमे ही रंग गया, होकर प्रेम विभोर । गोरी तेरे नैन हैं ,बहुत बड़े चित चोर […]

कविता

जज्बात

कुछ अपने अपने होकर भी गैर हो जाते हैं रिश्तों के सुर्ख जज्बात फीके रंग बिखरते हैं एक खूबसूरत अपनत्व जो कभी महका करता था जज्बातों के खुशबू से आज, बदलते रिश्तों की मानसिकता उसमें डूबा स्वार्थ की मंशा दर्द का नासूर बनकर चुभता है भुलाने लगे हैं लोग अपनों को अपनों से नहीं समझ […]

कविता

होली

न या पिचकारी न वा पिचकारी होली म अबकी चलइबे दुधारी खाली तिजोरी पीएनबी की करिगें सगल बोझ मोदी के काँधें म धरिगें सफाई के अभियान के बनिगें अगुवा रंगारंग खुद होइके नीरव निकरिगें बड़े बोल वालेन की बोली न निकरै गले मा फँसी है य हड्डी उधारी होली म अबकी चलइबे दुधारी… मिले एक […]

गीतिका/ग़ज़ल

“—————————- यह ना अपने हाथ ” !!

  हमें निमंत्रण राहें देती , यह ना अपने हाथ ! चाहत है या मजबूरी है , यह ना अपने हाथ !! पीछे छूटा यादें बन जो , साथ हमारे होगा ! सपने कितने अपने होगें , यह ना अपने हाथ !! चयन हमें ही करना होगा , राहें लगे लुभावन ! परिणामों को जान […]

कविता

समास

दो या दो से अधिक शब्दों का, मेल समास कहलाता है, इससे बना नया शब्द ही, ‘समस्त पद’ कहलाता है. अव्ययी भाव, कर्मधारय, तत्पुरुष, द्वंद्व, द्विगु और बहुब्रीहि, भेद समास के छः होते हैं, व्याकरण की है यह रीढ़. पहला पद प्रधान हो अथवा, पद पहला अव्यय होता, कभी शब्द पूरा अव्यय हो, अव्ययी भाव […]

हाइकु/सेदोका

होली है होली !!

प्रेम फागुनी मन के उत्सव में भीगता रहे ! .. रंग गुलाल चले भंग के संग मचाते शोर ! .. प्रेम फागुनी मन के उत्सव में भीगता रहे ! .. धरा ने खेला अम्बर संग रंग मचा धमाल ! … होली के रंग अपनों के संग हैं कहे फागुन ! … होली के रंग पिचकारी […]

कविता

मोह्हबत

मेरे आंसुओं का हिसाब कैसे चुका पाओगे जाओगे जब जन्नत में मेरा ही नूर पाओगे प्यार की जरूरत ने हमें भिखारी बना दिया दीवाने प्यार के हम जैसे और कहाँ पाओगे देखी न होगी ऐसी दर्द की दीवार ओ खास सदियों में कोई राधा हम जैसी ढूंढ पाओगे कब मांगा था तेरे दीदार के सिवा […]