पश्चात्ताप

भगमतिया टूटी खटिये पर बैठी खांसते खांसते दुहरी हो गयी थी । खांसते खांसते ही पानी की आस में घर में बहू की तरफ झांक भी लेती । बहू नीलम टूटे फूटे घर में झाड़ू मारते हुए बड़बड़ाये जा रही थी ,” इस बुढ़िया ने तो नाक में दम कर रखा है । न मरती है न चैन से जीने देती है । बच्चों को तैयार कराना और स्कूल में भेजना फिर घर में झाड़ू पोंछा क्या कम है ? ऊपर से इन महारानी की जिम्मेदारी । काम पर भी जाना है । ” बड़बड़ाती हुई नीलम जब तक पानी लेकर सास के पास पहुंचती उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे ।
 आनन फानन हरीश को उसके मां के गुजरने की खबर दी गयी जो कि गांव में ही आरा मशीन पर मजदूरी करता था ।
पड़ोसियों व रिशरेदारों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार की विधियां पूरी कराई जा रही थी । मृतात्मा की शांति के लिए मंत्रोच्चार के बीच पड़ोसी पंडित दीनानाथ ने हरीश से भगमतिया के निर्जीव शरीर को पानी पीलाने का निर्देश दिया ।
पड़ोसी महिलाओं की झुंड में सुबक रही नीलम सोच रही थी ‘ काश ! मैंने यही पानी उसे कुछ देर पहले वक्त रहते पीला दिया होता तो शायद हरीश को उसके मृत शरीर को पानी देने की नौबत नहीं आती । ‘ और उसका रुदन और तेज हो गया ।

परिचय - राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।