ग़ज़ल : फ़र्ज़ अपना भूल जाये उस दिये को फूँक दो

फ़र्ज़ अपना भूल जाये उस दिये को फूँक दो
आग जो घर को लगाये उस दिये को फूँक दो ।

भूलकर मकसद गर अपना वो धुआँ देने लगे
कौन फिर उसको बचाये उस दिये को फूँक दो ।

तेल है , बाती भी है पर , हौसला बिल्कुल नहीं
जो हवा से लड़ न पाये उस दिये को फूँक दो ।

घर हमारा बिन चिरागी हो के रह जाये भले
खूँ के वो आँसू रुलाये उस दिये को फूँक दो ।

वो अँधेरे का हमारे चाँद सूरज हो मगर
दिन में वोे तारे दिखाये उस दिये को फूँक दो ।

राजधानी में जले चाहे गली में , गाँव में
रोशनी जो दे न पाये उस दिये को फूँक दो ।

— डी एम मिश्र

परिचय - डॉ डी. एम. मिश्र

उ0प्र0 के सुलतानपुर जनपद के एक छोटे से गाँव मरखापुर में एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार में जन्म । शिक्षा -पीएच डी ,ज्‍योतिषरत्‍न। गाजियाबाद के एक पोस्ट ग्रेजुएट कालेज में कुछ समय तक अघ्यापन । पुनश्च बैंक में सेवा और वरिष्ठ -प्रबंघक के पद से कार्यमुक्त । विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में 400 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित और कई बार आकाशवाणी व दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण । ‘इज्जतपुरम्’ , ‘उजाले का सफर’ , ‘ रोशनी का कारवॉ ’ , ‘यह भी एक रास्ता है’ सहित आठ काव्य- कृतियाँ प्रकाशित । ‘‘ आईना - दर - आईना ’’ , गजल संग्रह शीघ्र प्रकाश्य ।कई साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं से पुरस्कृत । अवधी अकादमी का ‘ ‘जायसी पंचशती सम्मान’ , भारत - भारती का ‘ लोकरत्न सम्मान’ , राष्ट्रीय साहित्य पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘ भारती -भूषण सम्मान ’ , प्रेमा देवी त्रिभुवन अग्रहरि मेमोरियल ट्रस्ट अमेठी द्वारा प्रशस्ति पत्र , , दीपशिखा सम्मान , रश्मिरथी सम्मान आादि ! सम्पर्क:604, सिविल लाइन, निकट राणा प्रताप पी0जी0 कालेज सुलतानपुर-228001 मो0 9415074318