खुद हर्षो, सबको हर्षाओ

हम आत्मिक प्रेम के दीवाने,
हम आत्मिक प्रेम के परवाने,
हम आत्मिक प्रेम पाना चाहें,
आत्मिक प्रेम ही हम देना जानें.
है आत्मिक प्रेम में चाह नहीं,
आत्मिक प्रेमी को परवाह नहीं,
वह निज मस्ती में चलता है,
भरता है कभी वह आह नहीं.
सुख में सब रहते राज़ी हैं,
वह दुःख में भी रहता राज़ी,
भावी की उसको फ़िक्र नहीं,
उसको न सताता है माज़ी.
भावी तो कल्पना कोरी है,
वह भूत को माने है सपना,
वह वर्तमान में रहता है,
यह पल ही तो केवल अपना.
इस पल में आत्मिक प्रेम करो,
इस पल में ही उसको पाओ,
मिल जाए आत्मिक प्रेम अगर,
खुद हर्षो, सबको हर्षाओ.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।