लेख– मानवता का धर्म क्यों भूल रहा हमारा समाज

आज हमारे समाज में मानवता रूपी फूल मुरझा सा गया है। आभासी दुनिया में लोग इतने मशगूल हो गए हैं, कि वास्तविक दुनिया उससे कराह उठी है। कहते हैं, मानवता की सेवा करने वाले हाथ उतने ही धन्य होते हैं, जितना प्रार्थना करने वाले होंठ। पर आज मानवता बची कहाँ है, लोग समाज में एक-दूसरे को आंखों नहीं सुहाते। जो भारतीय समाज संस्कृति और सभ्यता का प्रधान देश था, आज शायद उसने अपने सद्गुणों औऱ सामाजिक सहयोग आदि की भावना को खूंटी पर टांग दिया है। तो यह समाज के सामने विकट स्थिति है। जिसका परिणाम यह हुआ कि, मानवतावादी दृष्टिकोण धूल- धूसरित होता जा रहा। आज का भारतीय समाज सिर्फ़ आर्थिक विकास की दौड़ में आगे रहना चाहता है, लेकिन भौतिक सुविधाओं की फिक्रमंद होती सामाजिक व्यवस्था यह क्यों भूल रहीं, कि बिना सामाजिक सुरक्षा और सहयोग के इन सुख- सुविधाओं का कोई मोल नहीं।

आज देश का कोई भी हिस्सा हो, चाहें वह मध्यप्रदेश हो, बिहार हो या आंधप्रदेश। हम हर बात पर दोष रहनुमाई व्यवस्था पर थोप देते हैं, लेकिन हर मर्ज़ की घुट्टी रहनुमाई व्यवस्था ही समाज को नहीं पिला सकती है। आज वक्त समाज को अपने गिरेबां में भी झांकने का है। कि कैसे आदमी, आदमी के बीच आपसी सहयोग की भावना निकृष्ट हो गई है। क्या कारण है, जिसके कारण समाज संवेदनहीन होता जा रहा है। बीते दिनों मध्यप्रदेश सूबे में दो घटनाएं घटी, जिसने मानवता और सामाजिकता के मजबूत इरादों पर यक्ष प्रश्न ख़ड़े कर दिए। पहला पुलिस कर्मी की सड़क दुर्घटना हुई, तो लोग दर्शक बनकर वीडियो बनाते रहें। दूसरी रात में लड़की से छेड़छाड़ हुई, औऱ मदद की गुहार लगाने पर भी फ़ौरी रूप से सहायता के लिए कोई आगे नहीं आ सका। ये तो चंद उदाहरण है, वैसे पूरे देश की तस्वीर यहीं है। कहते हैं, कि समाज आपसी सहयोग और सद्भाव से निर्मित होता है। वर्तमान दौर में जैसी स्थितियां हमारे समाज में निर्मित हो रहीं हैं, उसे देखकर हम डंके की चोट पर यह कह सकते हैं , हमारे समाज की मानवता और सद्भाव तो अब सांप्रदायिकता और जातिवाद की जकड़न में बंध चुका है।

ऐसे में अगर आपसी सहयोग की नींव भी दरक गई, तो समाज अपने बनाएं, जंगलराज में कब तक सुरक्षित रह पाएगा। यह हमारे समाज को विचार-विमर्श करना होगा, क्योंकि सहयोग की भावना कमतर तो हो रहीं ही है। कहते हैं, पर उपदेश सकल बहुतेरे। तो अगर लोग हर बात पर सरकारों को कर्तव्यनिष्ठ होने की सलाह देने से पहले अगर यह समझ जाएं, वही नियम उनके लिए भी है। और अपने नागरिक होने का कर्तव्य निभाएं, तो समाज की कुछ बुराइयां और समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाएं। लेकिन आज हमारा समाज इतना निकृष्ठता पर आ गया है, कि उसे सिर्फ़ आभासी दुनिया का लाइक औऱ कॉमेंट्स ही सुहाने लगा है। यह बड़ी दुःखद बात है। अगर राष्ट्रीय राजधानी में लड़कियों का पीछा करने वालों, ग़लत निगाह से घूरने वालों की संख्या में वर्ष 2016-17 में लगभग 160 फ़ीसद वृद्धि हुई। फ़िर देश के अन्य हिस्सों की क्या स्थिति रही होगी? इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नजर आता है।

आज समाज अपनी नैतिकी औऱ सामाजिकता किसी एक बात को लेकर नहीं खो रहा। सिर्फ छेड़खानी ही नहीं, आज तो स्थिति यहाँ तक आ गई है, अगर कोई भोपाल जैसी जगह पर सड़क दुर्घटना का शिकार हो जाएं, तो आभासी दुनिया का शिकार होता समाज मदद न करके पहली रूचि वीडियो बनाने में दिखाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी दिल्ली में लगभग 85 फ़ीसद लोग घायलों की मदद करने से कतराते हैं। जिसके कारण लगभग 50 फ़ीसद के क़रीब लोग चिकित्सीय सहायता न मिलने के कारण जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं। तो हम सोच सकते हैं, यहीं स्थिति देश के अन्य हिस्सों की भी होगी। हम भले ही तकनीकी रूप से समृद्ध हो रहें हैं, लेकिन हम अपने दायित्वों, मूल्यों, संस्कारों और सहभागिता का गुण भूल कर सामाजिक अवनित को गले में बांध रहे हैं, जो चिंताजनक स्थिति है। कहते हैं, जरुरी नहीं की जिनमें सांसें नहीं वो मुर्दा है, जिनमें इंसानियत नहीं, वो भी मुर्दा है। यह बातें आज के दौर में चरितार्थ हो रहीं है, क्योंकि समाज में सहभागिता का गुण ही कमजोर नहीं हो रहा। अपने खून का रिश्ता भी कमजोर पड़ रहा है। फ़िर समझ नहीं आता, हम कैसे समाज का निर्माण कर रहें हैं। समाज में आपसी स्नेह और भाईचारे की भावना दम तोड़ रही है। अगर समाज में निर्दयता और हैवानियत बढ़ रही। आधुनिकता के चक्रव्यूह में नैतिकता और मर्यादाएं क्षीण हो रहीं, तो उसे बचाने के लिए समाज और समाजशास्त्रियों को चिंतन और मनन करना होगा, वरना समाज घोर अंधकार की तरफ़ कुच कर जाएगा। अंत मे सब इतना कहते हैं, कि – गुणों से मानवता की पहचान होती है। ऊँचे सिंहासन पर बैठने से नही, महल के उच्च शिखर पर बैठने के बावजूद कौआ का गरुड़ होना असंभव है। तो फ़िर हमारा समाज मानवतावादी आचरण क्यों त्याग रहा।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896