शांति का वास

कोई समुद्र तट पर, इक शंख ढूंढता है,
हलचल भरे इस जग में, शांति को ढूंढता है.
थोड़ा-सा प्रयास करके, शंख को पा लिया है उसने,
शांति मिली यहीं पर, माना है ऐसा उसने.
मारा किसी ने कंकड़, हलचल हुई है जल में,
शांति भी खो गई है, छोटे-से उस पल में,
लहरें मचल रही हैं, सागर के नीले जल में,
सागर भी दे न सका जो, ढूंढें किसी महल में.
जंगल भी दे न पाया, शांति को पाएं कैसे?
किस जगल और कैसे मिले, कितने लगेंगे पैसे?
यह सोचकर उठा वह, पहुंचा किसी चमन में,
फूलों में उसको ढूंढा, ढूंढा उसे गगन में.
बाज़ार में भी पूछा, पूछा नगर-नगर में,
मंदिर में भी खोज आया, ढूंढा डगर-डगर में.
एकांत में जा बैठा, सब सोच छोड़कर वह,
मन शांत हो गया था, निष्पाप-निश्चल-निःस्पृह.
शांति बसी थी मन में, वह ढूंढता था बाहर,
वह ढूंढती उसको, उसको पता न था पर.
अब शोर है न हलचल, बस शांति ही का वास है,
जंगल हो चाहे दंगल, मन में उसी की सुवास है.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।