सेना प्रमुख के बयान पर विकृत राजनीति और बहस

वर्तमान समय में देश का राजनैतिक स्तर व बहस के मुददे इतने गिरते जा रहे हैं कि अब बौद्धिक रूप से मजबूत जनमानस टीवी पर होने वाली बहसों और चर्चाओं को नजरअंदाज करने लग गया है। सोशल मीडिया व टीवी चैनलों के दौर में केवल अपनी टीआरपी बढ़ाने के उद्देश्य से तथा अपनी राजनीति को चमकदार रखने के लिये ऐसी बयानबाजी करते हैं जैसे उनसे बड़ा समझदार और देशहित व समाजहित के लिए उनसे अधिक जानने वाला कोई नहीं है। अभी देश में तीन महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। कनाडा के पीएम अपने परिवार के साथ सात दिनों की यात्रा के लिए भारत पहुँचे। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में संघ के 125 स्कूलों को बंद करने का तुगलकी फरमान सुना दिया और एक बार फिर अपना मुस्लिम प्रेम दिखा दिया। वहीं देश के सेना प्रमुख विपिन रावत ने असम दौरे मेें एक सेमिनार में बांग्लादेशी घुसपैठ पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए एक बड़ा बयान दिया। इन तीनों ही घटनाओं को सेकुलर मीडिया ने अपने राजनैतिक आकाओं के हिसाब से तोड़ मरोड़कर पेश किया और एक गर्मागर्म बहस तैयार करने का काम किया।
जिसमें सबसे अधिक चर्चा सेना प्रमुख के बयान पर हो गयी जबकि उन्होंने असम की बांग्लादेशी घुसपैठ के बारे में वास्तविक बातें ही रखी थी तथा उनका कोई राजनैतिक उद्देश्य नहीं था। लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले दलों को मिर्ची लगनी थी सो लग गयी। ये वही दल व नेता हैं जिन्हें थलसेना प्रमुख सड़क के गुंडे लगते हैं। ये वही दल हैं जो कश्मीर घाटी में पत्थरबाजों व अलाववादियों के खिलाफ सेना के इस्तेमाल का विरोध करते हैं। ये वही लोग हैं जो समय-समय पर कश्मीर में आपरेशन आल-आउट का विरोध करते हुए कहते हैं कि सेना को बैरकों में ही रहना चाहिए, क्योंकि आपरेशन आल-आउट के कारण तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों का मुस्लिम वोट बैंक खतरे में पड़ रहा है। जब से सेना प्रमुख बिपिन रावत ने कमान संभाली है और भारतीय सेना लगातार बेहद विपरीत परिस्थितियों में देश की सुरक्षा में लगी है तथा सीमा पार से होने वाले हर प्रकार के खतरे का डटकर सामना कर रही है, तब से इन राजनैतिक दलों को अपना वोटबैंक खतरे में नजर आने लगा है। ये सभी दल किसी न किसी बहाने भारतीय सेना को बदनाम करना चाहते हैं।
यह कटु सत्य है कि पूर्वोत्तर के राज्यों विशेषकर असम और बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठ एक बहुत बड़ी समस्या बन गयी है। यह भी पता है कि इन तत्वोें को कौन से दल व नेता हर प्रकार का संरक्षण व सहायता प्रदान कर रहे हैं। अभी रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति सबसे बड़ा और खतरनाक प्रेम सबसे पहले एआईएमआईएम अध्यक्ष असबुद्दीन ओवैसी ने दिखाया था और फिर उसके बाद याकूब मेनन और अफजल प्रेमी गैंग सुप्रीम कोर्ट की चौखट में पहुंच गया कि वे शरणार्थी हैं, उन्हें शरण दी जाये।
सेना प्रमुख के बयान के बाद यही गैंग एक बार फिर ओवैसी के नेतृत्व में सक्रिय हो उठा और ताबड़तोड़ बयानबाजी करने के बाद टीवी चैनलों पर चर्चा शुरू हो गयी। वहीं इसकी आड़ में भारतीय सेना व बीएसएफ के जवान जिस प्रकार से सीमा पर पाकिस्तान को करारा जवाब दे रहे हैं, वह भी पीछे छूट गया।
सेना प्रमुख बिपिन रावत ने सेमिनार में कहा था कि पूर्वोत्तर को अशांत रखने के लिए चीन की मदद से चलाये जा रहे परोक्ष युद्ध के अंतर्गत पाकिस्तान अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत में योजनाबद्ध तरीके से भेज रहा है और वे हमेशा यह कोशिश करेंगे कि परोक्ष युद्ध और घुसपैठ के द्वारा इस क्षेत्र पर नियंत्रण का प्रयास कर लें। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ और बदरूद्दीन की पार्टी एआईयूडीएफ पर बयान देते हुए कहा कि असम में भाजपा को उभरने में कई साल लग गये, लेकिन एआईयूडीएफ का उभार बहुत तेज गति से हो रहा है तथा इसका सबसे बड़ा कारण है कि बांग्लादेशी इस दल में काफी सक्रिय रूप से शामिल हो रहे हैं। उनका कहना सही भी है क्योंकि अभी विगत चुनावों में बदरूद्दीन की पार्टी के साथ भाजपा को रोकने लिए सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतें चुनावी तालमेल को लेकर काफी परेशान थीं। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका था।
एआईयूडीएफ का असम की राजनीति में उभार तो काफी तेज गति से हो रहा है इसमें कोई दो राय नहीं हैं, लेकिन ओवैसी को मिर्ची अवश्य लग गयी है। असम में 2005 में इस दल का गठन किया गया था। 2006 में ही इस दल को काफी चैंकाने वाले अंदाज में 10 सीटें मिल गयीं। लेकिन 2011 के चुनाव में बांग्लाभाषी मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में 18 सीटें बटोर लीं। फिलहाल लोकसभा में उनके तीन सांसद और असम में 13 विधायक हैं। बदरूद्दीन पैदा तो असम में ही हुए हैं, लेकिन मुंबई में कपड़ों, रियल स्टेट, चमड़ा, शिक्षा और इत्र का विशाल कारोबार चलाते हैं। विगत विधानसभा चुनावों में यह चर्चा बड़ी गर्म थी कि एक न एक दिन असम में बांग्लादेशी घुसपैठिया भी मुख्यमंत्री बन सकता है। लेकिन मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के पद और सीटों के बंटवारे को लेकर धर्मनिरपेक्ष ताकतों के बीच विवाद के चलते समझौता नहीं हो पाया। वोट विभाजन के चलते असम में पहली बार भाजपा की अकेले बहुमत की सरकार बन गयी। असम में बदरूद्दीन अजमल के विरोधी भी मानते हैं कि उनकी निचले असम के ग्रामीण इलाकों में गरीबी से परेशानहाल मुसलमानों पर पकड़ मजबूत है। वह कई मदरसे, अस्पताल और अनाथालय चलाता है। लेकिन यह भी सच है कि घुसपैठ का दायरा विस्तृत हुआ हैंा सेना प्रमुख ने मात्र उसी की चिंता जाहिर की थी, कोई राजनैतिक बयानबाजी नहीं की थी।
लेकिन सांसद ओवैसी जो आजकल अपने आपको देश के मुसलमानों का एकमात्र नायक साबित करने में जुटे हुए हैं, ने कोइ देर नहीं कि और कह डाला कि सेना प्रमुख को राजनैतिक बयानबाजी से बचना चाहिए। वहीं फिर उसके बाद होड़ मच गयी। उनके समर्थन में संदीप दीक्षित से लेकर मीम अफजल, मनीष तिवारी व स्वयं बदरूद्दीन अजमल भी मैदान में कूद पड़े और सेना प्रमुख के खिलाफ बोल पड़े। यह वही गैंग था जिसने सेना से सर्जिकल स्ट्राइक से सबूत मांग लिये थे। अब यही लोग राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के पास शिकायत लेकर यह कहने जा रहे हैं कि सेना प्रमुख को राजनैतिक बयानबाजी करने से रोका जाये। यह एक चिंता का विषय है। अजमल ने दो हाथ आगे बढ़कर कहा कि यदि हम घुसपैठिये हैं, तो बयानबाजी करने की बजाय हम सभी लोगों को बांग्लादेश वापस भेज दिया जाये।
आज विपक्ष को पीएम मोदी व बीजेपी के खिलाफ समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें किस प्रकार रोका जाये तथा उनका एजेंडा किस प्रकार से सेट हो कि उनकी नैया फिर से पार हो सके। ये लोग देशहित को पूरी तरह से भूल चुके है तथा अपने निहित स्वार्थों में डूबकर बयानबाजी कर रहे हैं। ये सभी दल जिस प्रकार से बयानबाजी कर रहे हैं उसके कारण ये दल एक्सपोज होते जा रहे हैं और जनता से दूर भी। बांग्लादेशी घुसपैठ एक बहुत बड़ी गंभीर समस्या बनती जा रही है तथा असम की जनसंख्या में तेजी से खतरनाक स्तर पर बदलाव हो रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी है कि बांग्लादेशी घुसपैठ पर कोई नियंत्रण नहीं है तथा उनकी जनसंख्या में भी तीव्रगति से वृद्धि हो रही है तथा उन्हें क्षेत्रीय कट्टरपंथी दलों का संरक्षण भी प्राप्त हो रहा है तथा अल्पसंख्यकवाद की राजनीति करने वाले दल राजनीति कर अपने निहित स्वार्थों को साधते हैं।
मृत्युंजय दीक्षित