लघुकथा

ऊंची छलांग

कुछ देर पहले ही विदेश से सुरेंद्र का फोन आया था. फोन सुनकर नीलिमा फूली नहीं समा रही थी. भावातिरेक से उसकी आंखें छलक आई थीं. सुरेंद्र ने समाचार ही ऐसा सुनाया था. उसने कहा था-

 

”मां, आप सबको यह जानकर अत्यंत हर्ष होगा, कि आज मुझे कम्पनी का सबसे ऊंचा पद मिल गया है. अभी-अभी यहां के बहुत-से समाचार पत्रों के पत्रकार मुझसे साक्षात्कार लेकर गए हैं. समाचार छपने पर मैं उनका लिंक भेजूंगा. हो सकता है, भारत के समाचार पत्रों में भी मेरे बारे में समाचार छपें.”

 

नीलिमा को बीस साल पहले के दृश्य याद आ रहे थे. वह अपने देश में इंजिनियर अच्छे पद पर नियुक्त था. उसने विदेश जाने के बारे में कभी सोचा भी नहीं था. उसकी किस्मत में विदेश जाना लिखा था, सो किसी अन्य इंजिनियर ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उसका बॉयो डेटा विदेश की कम्पनी को भेज दिया था. माता-पिता को अकेला छोड़ वह विदेश जाना नहीं चाहता था. एक साल तक उस कम्पनी का तकाज़ा चलता रहा, आखिर उसका दाना-पानी वहां लिखा था, सो जाना पड़ा. जाने से पहले उसने कम्पनी से साल में दो टिकट भारत के स्वीकृत करवा लिए थे, ताकि वह साल में दो बार अपने देश आ सके. वह आता भी था. नीलिमा को कभी लगा ही नहीं, कि उसका बेटा विदेश में रह रहा था. सुरेंद्र की ऊंची छलांग पर नीलिमा को हर्षमिश्रित गर्व था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “ऊंची छलांग

  1. बच्चों की ऊंची छलांग पर मां की खुशी का ठिकाना नहीं रहता. सुरेंद्र ने अपनी मेहनत पर भरोसा किया और अब उसकी ऊंची छलांग सबकी खुशी का कारण बन रही है.

Leave a Reply