प्रेम-प्यार की झपताल: डॉ. सिंधुताई सपकाल

                                                                       विश्व महिला दिवस पर विशेष

विश्व महिला दिवस पर हम आपको नारी शक्ति की प्रतीक महान नारी सिन्धुताई से मिलवा रहे हैं. हम इन्हें 1400 अनाथ बच्चों की चौथी पास मां भी कह सकते हैं. उन्होंने अपना पूरा जीवम असहाय बच्चों को अपनाते और लोगों से मदद इकट्ठा करते हुए गुजर दिया। सालों के इस संघर्ष की बदौलत आज उन्होंने 1400 से ज्यादा बच्चों को अपने आश्रम में पाला और पढ़ाया है. इस बड़े से उनके परिवार में आज 207 दामाद और 37 बहुएँ और हजारों नाती-पोते पोतियां है. सभी बच्चों को अच्छी से अच्छी पढ़ाई का मौका दिया जाता है. सैकड़ों बच्चे आज डॉक्टर, इंजीनियर वकील और बड़ी कंपनियों में कार्यरत है। इनमे से एक PhD स्कॉलर भी हैं. सिन्धुताई के आज अनेक बहुत बड़े आश्रमों में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग अलग आश्रम हैं इनमें से एक आश्रम गायों के लिए भी हैं. उनकी बेटी और अन्य गोद लिए बच्चे आज अनेक अनाथ आश्रम शुरू कर चुके है.

इनका जन्म महाराष्ट्र के वर्धा जिले के पिम्परी मेघे गांव में 14 नवम्बर 1948 को हुआ था. उनका जन्म एक अत्यंत गरीब ग्वाले के घर मे हुआ था। कन्या होने के कारण वो एक अनचाही औलाद थी इसलिए बचपन से ही उन्हें “चिन्दी” कह कर पुकारा जाता था, जिसका मतलब होता है कपड़े का एक फटा हुआ टुकड़ा.

उनके पिता उन्हें शिक्षा दिलवाना चाहते थे, मगर उनकी माता इस बात के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थीं. इसलिए पिता ने पशु चराने के बहाने अपनी उस बेटी को पढ़ने के लिए स्कूल भेजते थे. गरीबी होने के कारण पिता उन्हें लिखने के लिए स्लेट नहीं दिलवा पाए तो सिन्धुताई को पेड़ के बड़े पत्ते तोड़कर उन्हें स्लेट की तरह इस्तेमाल करना पड़ता था.

किसी तरह उन्होंने चौथी तक की पढ़ाई पूरी कर ली मगर गरीबी के कारण उसे आगे न बढ़ा सकी थीं. 10 वर्ष की नादान उम्र में ही सिन्धुताई का विवाह दूसरे गांव के 30 वर्ष के एक चरवाहे से करवा दिया गया. 20 बर्ष की आयु तक पहुंचते-2 वह 3 पुत्रों की मां भी बन गईं.

इसी दौरान गांव के एक बड़े ताकतवर आदमी के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई, जो गांववालों से गोबर के उपले इकट्ठे करवाकर उन्हें अच्छे दामों में बेच दिया करता था. इस काम के लिए वह जंगल अधिकारियों की मदद लेता था महार गांववालों को कोई भी पैसा नहीं चुकाता था.

सिंधुताई के इस कदम ने जिला अधिकारी का ध्यान इस ओर आकर्षित किया और फिर जिला अधिकारी ने पाया कि वो आदमी गांववालों से धोखा कर रहा है. जिला अधिकारी ने सरकारी फरमान जारी किया, जो उस ताकतवर आदमी को बिल्कुल भी रास नहीं आया. उसने सिंधुताई को सबक सिखाने के लिए उसने किसी तरीके से सिंधुताई के पति श्रीहरि को अपनी पत्नी को घर से निकलने के लिए राजी कर दिया.

श्रीहरि ने उन्हें अपने घर से निकाल दिया. सिंधुताई अपनी रात घर के बाहर गौशाला में गुजारने के लिए मजबूर हो गईं. 14 अकटुबर 1973 की वो रात जब वह 9 महीने की गर्भवती थी तो घर के बाहर बने गौशाला में उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया. उस समय वो बिल्कुल अकेली थी न तो पति न कोई गांव वासी उनकी उस नाजुक घड़ी में उनकी मदद करने आगे आया.

अगली सुबह दर्द से तड़पते हुए जैसे तैसे वो अपनी मां के घर पहुंची, मगर उनकी मां ने किसी तरह की मदद और अपने घर मे उन्हें रखने से मना कर दिया. उस अत्यंत मुश्किल की घड़ी में उनके सामने आत्महत्या ही सबसे आसान रास्ता बाकी था, मगर बच्ची को देखते हुए वो ऐसा कुछ न कर पाईं. वे पेट पालने के लिए वह रेलवे स्टेशन पर भीख मांगने के मजबूर हो गईं. इसी तरह से कर दिनों तक वह भीख मांग कर अपना पेट पालती रहीं. इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि ऐसे बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें अपने माता-पिता द्वारा ठुकराया गया है और वो सब भी यहां भीख मांगते हैं.

सिन्धुताई की महानता की पराकाष्ठा-

सिन्धुताई ने उन सब बच्चों को गोद ले लिया और उन सब का पेट भरने के लिए अब और ज्यादा भीख मांगनी शुरू कर दी. इन बच्चों की पीड़ा देखते हुए कुछ दिनों बाद सिन्धुताई ने निर्णय लिया कि वो हर उस बच्चे को गोद ले लेगी, जिन्हें उनके माँ-बाप ने ठुकरा दिया है. इसी बीच कुछ वर्षों बाद उन्होंने अपनी बेटी को एक बाल आश्रम में donate कर दिया और इसका कारण था कि कहीं किसी भी तरीके से अपनी बेटी की ममता के कारण गोद लिए बच्चों के साथ भेदभाव न कर बैठे.

उनके जीवन को देखते हुए उनके पति 80 वर्ष की उम्र में उनसे माफी मांगते हुए वापिस उनके पास आये और साथ रहने की इच्छा जाहिर की. मगर सिन्धुताई जो अब सिर्फ हजारों बच्चों की मां थी, अपने पति को सिर्फ एक शर्त पर अपनाने के लिए तैयार हो गई, कि अब वो उन्हें सिर्फ एक बच्चे के रूप में अपना सकती है. आज भी जब कोई उनके आश्रम में जाता है तो वह गर्व से कहती है कि उनका सबसे बड़ा बेटा 80 वर्ष का है. सिन्धुताई को प्यार से आज सभी बच्चे और अन्य लोग प्यार से ताई कहते हैं.

2016 में DY Patil Institute Of Technology And Research ने उन्हें Doctrate की उपाधि से समानित किया है. आज वही चौथी पास एवंअनाथों की “ताई” Dr. Sindhutai Sapkal बन गई है.

सिन्धुताई के जीवन पर आधारित 2010 में “मि सिन्धुताई सपकाल” नाम की एक मराठी फ़िल्म भी बनाई गई है जिसे world premere के लिए 54वें London Film Festival में शामिल किया गया था. इस फ़िल्म ने अनेक इनाम अपने नाम किए हैं. उनकी इस समाज सेवा भावना और योगदान को देखते हुए 750 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से समानित किया गया है.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।