असीम साहस की जीती-जागती मिसाल

आज हम आपसे राजेंद्र प्रसाद जी के बारे में बतिया रहे हैं. राजेंद्र प्रसाद जी का नाम आते ही हमारा और आपका ध्यान स्वतंत्र भारत देश के प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद जी की ओर जाता है, जो सच्चे देशभक्त और साहस के अनूठे उदाहरण भी थे.

 

 

आज हम जिन राजेंद्र प्रसाद जी की बात कर रहे हैं, वे एक बुज़ुर्ग पेंटर हैं और अपने नियत समय पर काम पर पहुंचते हैं. वे दिखने में भले ही एक सामान्य बुज़ुर्ग पेंटर हैं, पर है असीम साहस की जीती-जागती मिसाल और विनम्रता के शहनशाह. हमसे आज उनकी रास्ते में चौथी मुलाकात थी. हमारी आदत है, कि हम रास्ते चलते सबसे मन से और प्रेम से राम-राम करते हैं. अक्सर लोग अनजान होते हुए भी जबाब में मन से और प्रेम से “राम-राम जी, राम-राम” बोलते हैं और अगली बार मिलने पर कभी-कभी वे ही पहल कर लेते हैं. इस तरह मन को अनंत आनंद की प्राप्ति तो होती ही है और हमारी जान-पहचान में भी इज़ाफ़ा होता है. कई बार हमें उनमें से ब्लॉग्स के लिए कई किरदार भी मिल जाते हैं. इस ब्लॉग के किरदार राजेंद्र प्रसाद जी से भी इसी तरह मन से और प्रेम से राम-राम करने से ही हुई है. अब आप सोच रहे होंगे, कि मात्र मन से और प्रेम से राम-राम करने से ही हमें उनके साहस के जज़्बे और विनम्रता का पता चल गया. चलिए अब हम आपको और अधिक प्रतीक्षा नहीं करवाते और सीधे उनके व्यक्तित्व की बात पर आ जाते हैं.

 

 

हमारे राजेंद्र प्रसाद जी कई वर्षों से एक ही ठेकेदार के साथ काम कर रहे हैं. इसके कई कारण हैं. सबसे पहला कारण है, उनकी आपसी समझ. ठेकेदार की अधकही बात ही हमारे ये किरदार साहब समझ लेते हैं और तुरंत काम शुरु कर देते हैं और उसको भलीभांति अंजाम दे देते हैं, एक साथ टिकने के लिए यह सबसे आवश्यक बात है. हमारे राजेंद्र प्रसाद जी पैदल ही नियत समय पर ठेकेदार के घर के सामने, जो एकत्रित होने का स्थान है, पहुंच जाते हैं और फिर उनके साथ गाड़ी में जहां पहुंचना होता है, पहुंच जाते हैं. वापिसी में भी वे इसी तरह करते हैं. जो लोग समय पर नहीं पहुंच पाते हैं, उन्हें अपने साधन से ही काम पर पहुंचना होता है. हमारे राजेंद्र प्रसाद जी ने कभी पैसों का तकाज़ा नहीं किया, कभी वेतन बढ़ाने के लिए नहीं कहा, घर-बार होते हुए भी कभी वापिसी में देर-सवेर की शिकायत नहीं की और न कभी ओवरटाइम के लिए ज़िद्द. इसका अर्थ यह नहीं है, कि वे अन्याय सहने के आदी हो चुके हैं. सब कुछ भगवान के हवाले कर देने के कारण, जब अपने आप ही सब कुछ मिल जाता है, तो भला वे व्यर्थ ही गिला-शिकवा क्यों करें और किससे करें? उनसे काम भी हल्का लिया जाता है, ज़्यादा ऊपर चढ़ने का काम या खतरे वाला काम उन्हें नहीं दिया जाता है. उसका भी एक वाजिब कारण है.

 

 

हमारे राजेंद्र प्रसाद जी अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र हैं और बहुत लाड़-प्यार में पले हैं. वे हमेशा से ही एक मज़दूर की हैसियत से नहीं रहे हैं, बल्कि अनेक मज़दूरों को रोज़गार मुहय्या कराने का काम ही उनके जिम्मे था. वे एक बड़े खेत के मालिक थे और मज़दूरों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर काम करते थे. अनपढ़ और ईमानदार ज़मीदार के पुत्र हमारे राजेंद्र प्रसाद जी को स्कूली शिक्षा भी अच्छी तरह मिली थी. वहां भी सफलता ने उनके चरण चूमे थे. गांव के सभी लोग हिसाब-किताब के लिए उनके पास आते थे. मदद लेने के हुजूम को देखकर उनके पिता बहुत प्रसन्न होते थे और प्रसन्नता से सबकी सहायता करते देखकर उसे शाबाशी भी देते थे. गांव के सब लोगों के आशीर्वाद भी उन पर निरंतर बरसते रहते थे.

 

एक दिन उन सब आशीर्वादों पर ग्रहण लग गया. वे अपने बैलों को चारा खिलाने के स्वयं ही चारा काटते थे और उसमें अपने हाथ से पौष्टिक चीज़ें मिलाकर स्नेह व प्यार के साथ सिर पर हाथ फिराकर खिलाते थे. एक सुनहरी दिन को काटने की मशीन ने चारे के साथ उनके हाथ को भी काट दिया था. हाथ गया, तो क्या हौसले ने तो साथ नहीं छोड़ा था. इलाज में खेत बिक गए. बस तभी से वे ठेकेदार से दिहाड़ी पर काम करने वाले साधारण मजदूर बन गए और पेंटर के तौर पर काम कर रहे हैं. राजेंद्र भाई के हौसले को कोटिशः सलाम.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।