कर्मफल

रानी के सिर से माँ बाप का साया किशोरी होने से पहले ही उठ गया था। रानी जब अट्ठारह की हुई तो भाइयों ने उसके लिए वर ढूँढना शुरू कर दिया। भाइयों को ज्यादा दौड़धूप नही करनी पड़ी, बगल के ही गाँव में एक लड़का मिल गया, जिसके पास संपत्ति के नाम पे एक कच्चा घर था और परिवार के नाम पर एक बूढ़ी माँ, मुंबई की किसी मिल में काम करता था, महीनें में तीन चार हजार कमा लेता था। शादी की तिथि तारीख पक्की हो गई।
रानी ने बचपन से अब तक सिर्फ दुःख ही देखे थे। माँ का मुँह तक नही देखा, कभी कभी भाभियाँ ताने भी देती थी “करमजली कहीं की पैदा होते ही माँ को खा गई “। बेचारी रानी चुपचाप सब सुन लेती थी, कभी कभी हृदय की वेदना आँखो तक आ जाती थी, तो चुपचाप उसे अपने दुपट्टे के कोने में दफना देती थी। उसे अब भी याद है, बरसात के दिनों में घर की कच्ची दीवार एकाएक गिर गयी थी, और बापू उसी के नीचे दब गये थे, बेचारी रानी कई दिनों तक अपनी किस्मत को कोस कोस के रोती रही थी।
उसकी जिंदगी में पहली बार खुशी का कोई मौका आया था। वह रोज खुशियों के ताने बाने बुनती थी, मगर उसे यह भी याद आता था कि अगर आज अम्मा बापू जिंदा होते तो कितना अच्छा होता, और उसकी आँखे गीली हो जाती थीं। धीरे धीरे करके वह दिन भी आ गया जब दुआर पे बारात आयी। रानी को सिर से पैरों तक सजाया गया, वह बिल्कुल राजकुमारी लग रही थी।
सुबह रानी की विदाई हुई, वह अपने भाइयों के गले लगके बहुत रोई, उसे आज अपना घर छोड़ के जाने का दुख भी था।
रानी का पति बहुत ही अच्छा आदमी था, वह रानी का पूरा ख्याल रखता था। वह जब आता था, मुंबई से रानी के लिए कपड़े लाता था, क्रीम पावडर लाता था और साथ में लाता था ढेर सारा स्नेह। वह रानी को बहुत प्यार करता था। उसने रानी से यह भी वादा किया था कि, रानी ! मैं बहुत ही जल्दी इस कच्चे घर को पक्का करवा दूँगा। ताकी बरसातों में तुझे दिक्कत न हो।
मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था, इस बार जब रानी का पति आया तो वह सूख के काँटा हो गया था। उसे बार-बार खाँसी आ रही थी, तमाम इलाज करवाया मगर कोई फायदा नही हुआ।
वह शायद उसकी आखिरी रात थी, रानी उसी के पास बैठी थी, उसने मरियल सी आवाज में कहा- रानी मुझे माफ करना, मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ, मगर मैंने तेरे साथ दगा किया। पिछले साल कुछ यारों के बहकावे में आकर मैं कोठे पे गया, शायद भगवान मुझे उसी की सजा दे रहे हैं। रानी ने रोते हुए कहा कि तुम ठीक हो जाओ बस, मुझे कोई गिला नही। मगर उस बेचारी की अश्रुधारा उसके पति के सूख रहे जीवनरूपी पौधे को हरा न कर सकी।
भोर की पहली किरण के साथ उसके पति का शरीर ठंडा हो गया। बेचारी रानी पर दुखो का पहाड़ टूट गया, वह फिर अनाथ हो गई। वह पथराई आँखो से देखती रही और लोग उसके पति की लाश को जलाने के लिए लेकर चले गये, ठीक वैसे ही जैसे उसके बापू को लेकर चले गये थे।
वक्त ने रानी के अच्छे दिन छीन लिए। उसने भी दृढ़निश्चय कर लिया कि मदद के लिए अपनी फूटी किस्मत लेकर किसी रिश्तेदार के यहाँ नही जायेगी। कभी कभी तो भूखा सोना पड़ा, मगर किसी के आगे हाथ न फैलाया और न ही कोई रिश्तेदार मदद को आगे आया।
हाँ, रानी के पड़ोस में ही रहने वाले दिलेराम को जब यह बात पता चली तो उसने ग्राम प्रधान से इस बात का जिक्र किया। ग्राम प्रधान एक निहायत लंपट आदमी है, उसने जब यह जाना कि रानी, विधवा है, अकेली है, जवान है तो उस कामी ने रानी का अंत्योदय कार्ड बनवा दिया। अब रानी को भूखा नहीं सोना पड़ता था।
समय चलता गया, बरसात आई। रानी का कच्चा घर कमजोर साबित हो रहा था। इस बार उसने दिलेराम से कहा कि अगर प्रधान जी इंदिरा आवास दे देते तो अगले साल की बरसात तक शायद घर पर छत हो जाये।
दिलेराम ने फिर प्रधान से रानी की यह बात कही, प्रधान ने कहा कि उसे मेरे पास भेज दीजिएगा। इस बार प्रधान के दिमाग में एक घिनौनी योजना चल रही थी।
जब रानी प्रधान से मिलने आई तो प्रधान ने उसे बड़े प्यार से बैठाया और उसकी बात सुनी और कहा ठीक है, आई हो तो चाय पी लो और फिर चली जाना। तुम्हारा काम हो जायेगा।
थोड़ी देर बाद प्रधान का एक आदमी चाय लेकर आया रानी को चाय पीने के बाद अजीब सा लगने लगा, उसके बाद उसकी आंखे मूँदने लगीं। जब उसकी आँखे खुलीं तो वह एक बंद कमरे में निर्वस्त्र पड़ी थी। और थोड़ी दूर पर प्रधान बैठा मुस्कुरा रहा था। रानी ने कहा -आपने ठीक नही किया, एक गरीब विधवा की मजबूरी का फायदा उठाया है, मैं पुलिस में जाऊँगी, पूरे गाँव को बताऊँगी। प्रधान ने कहा कि अगर तुमने मुँह खोला तो मैं तुम्हारी नंगी तस्वीरों को सार्वजनिक कर दूँगा, जो मेरे मोबाइल में हैं, जाओ मेरा काम हो गया, तुम्हारा भी हो जायेगा।
उस पूरी रात रानी अपनी मजबूरी और दुर्भाग्य पर रोती रही। अगली दोपहर दिलेराम ने बताया कि तुम्हारा नाम आवास वाली सूची मे डाल दिया गया है।
एक दिन प्रधान जी खुद रानी के यहाँ आये और अपना मोबाइल दिखाते हुए बोले कि थोड़ा मेरी तरफ आ जाना। बेचारी लोकलज्जा के भय से फिर गई, इस बार वह होश में थी, और उसको नोचने के लिए तैयार था नवनियुक्त ग्राम विकास अधिकारी, इस तरह रानी का शरीर, अब प्रधान बड़े लोगों को और अपने खास लोगों को तोहफे में सौंपता था। प्रधान के लिए रानी मुहरा हो गई थी, किसी को भी खुश करने का साधन। रानी ने जब भी विरोध किया, प्रधान ने मोबाइल के फोटो दिखाकर धमकाया और रानी हर बार हार गई।
सब कुछ ज्यों का त्यों चल रहा था मगर इधर कुछ दिनों से रानी को लगातार बुखार हो रहा था। प्रधान ने गाँव के डाक्टरों से रानी की दवा करवाई, मगर सिर्फ इसलिए क्योंकि रानी के बीमार होने से उसके शरीर पर असर आता और उस नीच प्रधान के लिए रानी का शरीर बहुत काम की चीज थी। मगर रानी के स्वास्थ्य में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। गाँव के सारे झोलाझाप डाक्टरों की दवा फेल हो गई। अंततोगत्वा प्रधान जी ने रानी को शहर के हास्पिटल में भेजा। जब डाक्टरों को पता चला कि मरीज का पति किसी अनजान बीमारी से मरा था और मुंबई में रहता था, तो उन्हें शक हुआ और उन्होंने एचआईवी की जाँच लिख दी।  जाँच पाजिटिव थी। रानी को जब पता चला कि उसे एड्स हुआ है तो वह दुखी भी हुई और खुश भी। दुखी इसलिए हुई क्योंकि वह निरपराध थी और खुश इसलिए हुई क्योंकि उसे पता था कि जिस-जिस ने उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर उसका शारीरिक शोषण किया है। यह बीमारी उन सबको भी हो गई होगी।

जब यह बात प्रधान को पता चली तो उन्हें साँप सूँघ गया, उन्होंने तत्काल अपने पापकर्म के सारे साथियों को बुलाकर पूरी बात बताई। यह बात पता चलते ही सबकी आँखो के आगे अंधेरा छाने लगा। अब सबसे बड़ी समस्या थी कि जाँच करवाने कैसे जाया जाये। हर जगह जान पहचान के लोग हैं, लोग सोचेंगे कि हम लोग एचआईवी की जाँच क्यों करवा रहें हैं ? अंत मे इस समस्या का हल यह निकला कि किसी जान पहचान वाले आदमीं को बुलाकर खून के नमूने निकालकर शहर को भेजा जाये।

एक झोलाछाप ने सबके सैंपल निकाले और शहर भेजे। और जब शहर से रिपोर्ट आई तो सबके चेहरे उतर गये। दूर तक नैराश्य और भय का एक मृतसागर नजर आ रहा था, क्योंकि सबको एचआईवी का संक्रमण था।

सभी सोंच सोंच के मरे जा रहे थे, मगर अब क्या, अब तो पाप उघर गया था। पाप छिपाये नही छिपता, धीरे-धीरे पूरे गाँव मे दीवारों से कानों तक और कानों से कानाफूसी बनकर हर किसी को यह खबर लग गई कि प्रधान और उनके गुर्गे रानी का शारीरिक शोषण करते थे। जिससे उन्हे वही बीमारी लग गई, जो रानी का मर्द मुंबई से लाया था। मतलब रानी को एचआईवी का संक्रमण उसके पति से हुआ। और उसके पति को यह बीमारी मुंबई की किसी रेड एरिया से मिली।

प्रधान और अन्य पाप के भागीदारों का सामाजिक पतन हो गया है। प्रधान के पास अब परधानी भी नही है। एचआईवी की वजह से स्वास्थ्य भी खराब होता जा रहा है। दवाओं के सहारे अपने पापों का बोझ लादे हुए सभी अपनी जिंदगी को घसीट रहे हैं।

रानी भी एआरटी सेंटर पर दवा लेने आती है, उसे सुकून है, अब उसका शरीर नोचने वाले खुद अपना पाप भोग रहे हैं।

उन्हें उनके कर्मों का फल मिल गया है। मगर मैं अक्सर यह सोचता हूँ कि आखिर रानी को ऊपर वाला किन कर्मों की सजा दे रहा है?

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी

परिचय - डॉ दिवाकर दत्त त्रिपाठी

नाम डॉ दिवाकर दत्त त्रिपाठी आत्मज श्रीमती पूनम देवी तथा श्री सन्तोषी . लाल त्रिपाठी जन्मतिथि १६ जनवरी १९९१ जन्म स्थान हेमनापुर मरवट, बहराइच ,उ.प्र. शिक्षा. एम.बी.बी.एस. पता. रूम न. ,१७१/१ बालक छात्रावास मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज इलाहाबाद ,उ.प्र. प्रकाशित पुस्तक - तन्हाई (रुबाई संग्रह) उपाधियाँ एवं सम्मान - साहित्य भूषण (साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी ,परियावाँ, प्रतापगढ़ ,उ. प्र.) शब्द श्री (शिव संकल्प साहित्य परिषद ,होशंगाबाद ,म.प्र.) श्री गुगनराम सिहाग स्मृति साहित्य सम्मान, भिवानी ,हरियाणा अगीत युवा स्वर सम्मान २०१४ अ.भा. अगीत परिषद ,लखनऊ पंडित राम नारायण त्रिपाठी पर्यटक स्मृति नवोदित साहित्यकार सम्मान २०१५, अ.भा.नवोदित साहित्यकार परिषद ,लखनऊ इसके अतिरिक्त अन्य साहित्यिक ,शैक्षणिक ,संस्थानों द्वारा समय समय पर सम्मान । पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लेखन तथा काव्य गोष्ठियों एवं कवि सम्मेलनों मे निरंतर काव्यपाठ ।