नई पीढ़ी का स्वागत

आज उसका जन्मदिन है. जैसा कि होता है जन्मदिन वाले दिन सुबह से ही बधाई देने वालों का तांता लग जाता है, आज भी ऐसा ही हो रहा था. सब उसे जन्मदिन मुबारक कह रहे थे और कई अतीत की बातें याद दिला रहे थे. उन्हीं बातों के बीच वह सहज ही अपने अतीत में खो गयी थी.

सास-ससुर, जेठ-जिठानी, उनके बच्चे और अपने तीन बच्चों वाला परिवार. सब खीर-खांड की तरह मिले हुए. दोनों भाइयों के लहलहाते खेत और अपना-अपना फला-फूला व्यापार. अचानक एक रात घर में डकैती का पड़ना और एक गोली का पति को लग जाना. पल भर में सब कुछ स्वाहा हो गया था.

बचपन से एक हाथ से अपाहिज को पल भर के लिए लगा था कि जैसे आज दोनों हाथ चले गए हों, लेकिन जल्दी ही वह संभल गई थी. छोटी-सी उम्र लेकिन खुद के भरोसे पर उठ खड़ी हुई थी.

“न सरपंच जी, न चाहिए कोई टेलीफोन बूथ का परमिट या कोई और मदद.” मदद के लिये आगे आए हाथ को जवाब देती हुयी बोली थी वह. “किसी की जरूरत नाहिं हमें, वे ही तो गए हैं न! काम थोड़े ही ले गए हैं.”

और उसने एक हाथ से ही आटा-चक्की की दुकान संभाली और जुट गई बच्चों का जीवन संवारने में. बड़ी बेटी फैशन डिज़ाइनर, छोटी सी.ए. और बेटा अनाज का माना हुआ व्यापारी…… क्या नहीं था आज उसके पास! संस्कारी बहुएं, दामाद और प्यारे से नाती-पोते…….सभी कुछ तो था उसके पास.

“नानी मिठाई खिलाइये न,” अचानक नातिन की हर्षमय आवाज़ से वह लौट आई अपने वर्तमान में. “मेरा रिज़ल्ट आ गया, मैं वकील बन गई हूँ नानी.”

… और वह उठ खड़ी हुई अपने भरोसे के खिलते हुए उपहारों के साथ नई पीढ़ी का स्वागत करने के लिये.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।