मेरी आत्मस्वीकृति

बार-बार मेरी आत्मस्वीकृति सुनकर बहुत-से लोगों ने लाभ उठाया है. सच है, इंसान सिर्फ़ अपनी ठोकर से ही नहीं, दूसरे की ठोकर से भी सीखता है. आप भी सुनें मेरी आत्मस्वीकृति.

”आज जब तुम एक महीने बाद डॉक्टर को आंखें दिखाने (डराने नहीं, इलाज कराने) गईं तो घर आकर तुमने अपने आप से बात की, जैसा कि हर ग़लती के बाद करती हो. आज भी डॉक्टर ने फिर से आंखों में इंजैक्शन लगवाने को कहा.

आज फिर तुमने कहा- ”काश, तुमने ऐतबार किया होता!”

अब ऐतबार करना भी क्या सबके बस में होता है!

अक्सर हम ऐतराज ही करते हैं. तुमने ऐतराज किया, भले ही जताया नहीं!

क्या कभी तुमने विचार किया, कि दोनों शब्द ऐत से शुरु होते हैं, ऐतबार में होता है- प्यार-दुलार- अंत में आशीषों का उपहार, ऐतराज में होता है- दुरावा-छिपावा-अंत में पछतावा.

यही ऐतराज तुम्हारे हिस्से में आया.

तुम्हें याद होगा- जब तुम बड़ी-सी चद्दर पर बहुत भारी कढ़ाई करने लगी थीं, तब तुम्हारे ससुर जी ने अपने पैने अनुभव से कहा था- ”बहू, इतनी भारी कढ़ाई मत करो, इसी भारी कढ़ाई के कारण तुम्हारी सास की आंखें खराब हो गई थीं, छोटी उम्र में ही आंखों पर चश्मा चढ़ गया था.”

तुमने उनकी बात को कब माना! सारी दुनिया कढ़ाई करती है, यही समझकर सुना-अनसुना कर दिया.

बंद कमरे में लाइट जलाकर छिप-छिपकर भारी कढ़ाई करती रहीं, बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़ती रहीं. अब दुरावे-छिपावे का नतीजा पछतावे के सिवाय और क्या हो सकता है!

अब भुगतो नतीजा. लगवाओ रोज़ आंखों में इंजैक्शन. दिन में चार बार खाना भले ही खाओ-न-खाओ, रोज़ चार बार आंखों में ड्रॉप्स अवश्य डालो, दवाइयां खाओ. अब तो तुम्हें भी लगने लगा होगा-

”काश, तुमने ऐतबार किया होता”!

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।