मानव बनकर दिखलाएं हम

(तर्ज़- वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्त्तव्य मार्ग पर डट जाएं——)

 

हैं मानव तेरी दुनिया के, मानव बनकर दिखलाएं हम
ऐसा वर दो हे नाथ हमें, जग हेतु कुछ कर पाएं हम-

हम सरिता हैं तेरे सागर की, हम लहरें हैं तेरी सरिता की
ऐसा वर दो हे नाथ हमें, खुशहाली लहरा पाएं हम-

हम सुमन हैं तेरे उपवन के, हम कलिकाएं तेरी बगिया की
ऐसा वर दो हे नाथ हमें, संसार को महका पाएं हम-

हम शशि की शीतलता भगवन, हम किरणें हैं प्रभु सविता की
ऐसा वर दो हे नाथ हमें, संसार को चमका पाएं हम-

हम तितलियां हैं तेरे कुंजों की, हम कोकिल हैं अमराई की
ऐसा वर दो हे नाथ हमें, तेरे ही गुण गा पाएं हम-

हम इच्छाएं तेरे अंतर की, हम उमंगें हैं अभयंकर की
ऐसा वर दो हे नाथ हमें, जग को निर्भय कर पाएं हम-

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।