राजनीति

रानीगंज के दंगे- समस्या समझो फिर निपटो !

रानीगंज के हिंदू एकतरफा पिटने के बाद अब रो रहे हैं कि मटाडोर और अन्य गाड़ियों में हथियारबंद बाहरी मुसलमान उनके मोहल्लों में आये और उनके घर जलाकर, उन्हें कत्ल और घायल कर आराम से वापस चले गये। पोलिस बस देखती रही। आइये समझें ऐसा क्यों होता है।
इस्लाम के आखिरी पैगंबर मुहम्मद ने जिहाद यानी गैर मुसलमानों के खिलाफ धर्मयुध्द की सफलता के लिये तीन महत्वपूर्ण रणनीति निर्धारित की हैं :
1- धोखेबाजी
2- आतंक , और
3- पहले हमले की पहल
यही जिहाद की नैतिकता है। पैगंबर मुहम्मद ने बुखारी, हदीस संख्या 1213 , के अनुसार लड़ाई का नाम धोखा रखा है। हर मुसलमान के जीवन में यह इस्लामी दर्शन शांति और युध्द काल दोनों में समान रूप से कायम रहता है। चूंकि कुरानी दर्शन जिहाद है , जो काफिरों के विरूध्द चौतरफा लड़ाई है , इसलिये धोखेबाजी का आचरण उसके जीवन का अभिन्न अंग होता है। स्वयं मुहम्मद का जीवन इसका गवाह है। कैसे ? संक्षेप में :
मदीना में आसमा नामक कवियित्री की मुहम्मद ने बस इसलिये हत्या करवाई कि उसने मुहम्मद के खिलाफ तुकबंदी की थी।मदीना में ही एक सौ साल के वृध्द यहूदी कवि अबू अफाक थे। उन्होंने ने भी मुहम्मद के खिलाफ कविता बनाई थी।मुहम्मद ने उनकी भी हत्या करा दी। एक कवि जिनका नाम काब इब्न अशरफ था उसकी भी धोखे से इन्हीं कारणों के चलते हत्या करवा दी।फिर अपने अनुयायियों को यहूदियों की खुली हत्या की छूट दे दी।तब इब्न सुनैना नामके व्यापारी की उसी के टुकड़ों पर पल रहे एक मुसलमान ने हत्या कर दी। कवि नाजिर इब्न हरीथ को गिरफ्तार कर बस इसलिये कत्ल कर डाला गया कि उसने मुहम्मद की चुनौती स्वीकार करते हुये उन्हीं जैसी आयत बनाकर सुना दी थी।जो भी विचारशील थे और मुहम्मद की किसी भी रुप में स्वस्थ आलोचना भी करते थे उनकी धोखे से हत्या करवा देना नियम बन गया था।खैबर से मदीना आते हुये 28 यहूदियों की बिना किसी उकसावे के धोखे से हत्या करा दी गयी।उनका धन लूटा गया और औरतों को मुसलमानों में बांटा गया।बानू कुरेज़ा नामक यहूदी कबीले के 800 लोगों को गिरफ्तार कर दिन भर कसाई की तरह काटा गया और एक विशाल कब्र में भर दिया गया। कैनुका और बानू नाजिर नामक दो यहूदी कबीलों को सिर्फ इस्लाम न मानने के कारण , उनका सब कुछ लूटकर, मदीना से बेदखल कर दिया गया। मुहम्मद के जीवन काल में ही इस्लाम मानने को विवश करने के लिये काफिरों के विरूध्द तीन या चार को छोड़कर बयासी एकतरफा हमले किये गये। इनमें हत्या , लूट, अपहरण और विध्वंश का नंगा नाच हुआ। बेटे ने इस्लाम न माने जाने पर अपने पिता की हत्या की भी इस्लामिक कसम खाई । काफिर औरत की छाती से लगे दूध पीते बच्चे को झटके से अलग कर उसकी मां के सीने में खंजर भोंक दिया गया। उपर्युक्त सूची मात्र ही इस्लामी आतंक को दिखलाने के लिये पर्याप्त है।
स्पष्ट है कि कुरान, हदीस और मुहम्मद के क्रियाकलापों से शिक्षा ग्रहण कर मुसलमान छल-कपट और जिहाद से संपोषित जिहाद का पालन शांति और युध्दकाल दोनों में करते हैं। जब संख्या बल कम हो यह जिहाद अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होना है। अल्लाह ने भी अन्य कई आयतों के अलावा यह भी फरमाया है कि वह काफिरों के दिल में दहशत पैदा करेगा।
तीसरी रणनीति है पहले आक्रमण करना जब काफिर मुस्लिम योजना से बिलकुल अनजान और असावधान हों। ब्रि. मलिक ने ओहद की लड़ाई की समीक्षा में बताया कि कठिन परिस्थिति में भी मुहम्मद ने, जिसमें वो पराजित हुये,दांत भी टूटे और जान बची , पहले हमले की कार्यवाही शत्रु के हाथ नहीं जाने दी। यही रणनीति सभी मुस्लिम दंगों में देखी जाती है। जब गैर मुसलमान बिना किसी संदेह के निश्चिंततापूर्वक अपने कार्य में लगे रहते हैं मुसलमान उनपर हमला कर कत्ल ए आम मचा देते हैं।
यह भी लगे हाथ समझ लेना जरुरी है कि मुसलमान और गैर मुसलमान के बीच संघर्ष का लगभग स्थाई कारण राजनीतिक और आर्थिक न होकर धर्म ही है। यह भी हमारी कोरी भ्रांति और झूठा प्रचार है कि गरीबी, और बेरोजगारी के चलते मुसलमान जिहादी और आतंकवादी बन रहे हैं।
ओसामा बिन लादेन से मशहूर पाकिस्तानी पत्रकार रहीमुल्ला यूसुफज़ई , ए बी सी के पत्रकार जान मिलर एवं अरबी पत्रिका निदा-उल-इस्लाम द्वारा किए गये साक्षात्कारों के आधार पर कुछ चुनिंदा सवाल-जवाब “मुस्लिम आतंकवाद बनाम अमरीका” (वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली-11002) नामक पुस्तक में प्रकाशित किये गये हैं। एक प्रश्न में ओसामा से पूछा गया ,
” आप एक बहुत धनी घराने से सबंधित होने के बावज़ूद भी आराम की ज़िंदगी छोड़कर युध्द और कष्टों के बीच जीवन गुजार रहे हैं।अमरीकियों को यह बहुत अटपटा लगता है।
उत्तर – यह समझना बहुत मुश्किल है , खास तौर से उनके लिये जो इस्लाम को नहीं समझते। हमारे धर्म का यह विश्वास है कि अल्लाह ने हमें इसलिये बनाया कि हम उसकी इबादत करें। उसी ने हमें यह मजहब दिया। अल्लाह का आदेश है कि सर्वोच्चता कायम करने के लिये हम जिहाद करें। पश्चिम में यह झूठा प्रचार किया जाता है कि गरीबी के कारण लोग जिहादी बन रहे हैं। इसमें बहुत से धनीमानी युवा भी जुड़ चुके है।”
इसप्रकार हम देखते हैं कि कुरान, हदीस और सीरत-अन-नबी सम्मत इस्लामिक योजनाओं और क्रियाकलापों का जो चित्र उभरता है उसमें हर मुस्लिम कार्रवाई की जड़ में उसका मजहब ही था, है और कयामत तक रहेगा।
पर इतिहास की लंबी कालावधि में मुस्लिम चरित्र को देखकर भी हिंदू बुध्दिजीवियों, हिंदू राजनीतिज्ञों , हिंदू धर्म गुरुओं और हिंदू धर्म व्यवसाइयों ने कभी इस्लाम का गहन अध्ययन करने , उसके उद्देश्यों, कार्य योजनाओं और कार्यक्रमों – धोखेबाजी , आतंक , अचानक हमला – को इस्लाम के ही धर्मग्रंथों से और इसके खूनी इतिहास को समझने और हिंदुओं को समझाने का प्रयास ही नहीं किया। जब ऐसा नहीं किया तो उसके हमलों से बचने का उपाय कैसे करता ? इसीलिये हिंदू समाज इस्लाम के हाथों सदा कुचला गया- बिना समुचित प्रतिरोध के अनवरत । आज हिंदू अपने ही देश में अस्तित्व रक्षा की समस्या से ग्रसित है और तथाकथित हिंदू बुध्दिजीवी सामाजिक अस्तित्व की चिंता से मुक्त जीविकोर्पाजन तक ही सिमटा है।
अगर हिंदू समाज को इस्लाम के उद्देश्यों , शिक्षाओं और कार्यविधियो का ज्ञान होता तो वह विभाजन पूर्व कोलकटा की सड़कों और गलियों में भेड़-बकरियों की तरह काटा नहीं जाता। वह पहले से बचाव के साधनों और उपायों का प्रयोग कर हमलावरों का विनाश कर पाता। रानीगंज, बंगाल,में मुसलमान क्या करेगा उसको समझ हथियार बंद होकर तैयार रहता। देश के विभिन्न हिस्सों में जुम्मे की नमाज के बाद उपद्रवियों को सबक सिखा पाता। धार्मिक जुलूस निकालते समय हर तरीके से बचाव के लिये तैयार रहता।मुस्लिम परस्त सरकारों का क्या रवैया होगा, प्रशासनिक अधिकारियों के क्या निर्णय होंगे, मीडिया और सिकुलर बुध्दिजीवी क्या विषवमन करेंगे इसके लिये पहले से तैयार रहता। मुस्लिम नेता और मौलवी कैसी भाषा बोलेगा और मस्जिदों के माध्यम से मुसलमानों को क्या निर्देश देगा। मुस्लिम गुंडों को मजहबी मुजाहिदीन का सम्मान देकर कैसे थाने से छुड़ायेगा। ट्रकों पर लाठी , भाला , गड़ांसा , आग लगाने के सामानों को लादकर हिंदू विनाश के लिये उसे स्वयं जगह जगह भेजने की व्यवस्था कैसे करेगा। तब हिंदू को पता होता कि ये लोग कैसे-कैसे अत्याचार , दुराचार करेंगे और क्यों करेंगे। यह भी पता होता कि अपने किये हुये दुराचारों के लिये भुक्तभोगी पर ही दोषारोपण भी करेंगे। किसी समस्या के समाधान के लिये पहला कदम है उसे समझना।अगर समस्या का रुप सामाजिक है तो सामाजिक तौर पर एकजुट होकर समझना और एक होकर अपने बचाव की तैयारी रखना। अपने बचाव के लिये हर हालत में तैयार रहना गैर कानूनी भी नहीं है। आखिर देश का शांतिप्रिय बहुसंख्यक हिंदू अबतक सड़क पर औंधे मुंह लेटकर अपने साथ दुष्कर्म की प्रतीक्षा करता रहेगा !
भूमिका में जो ऊपर लिखा गया है वो बेमतलब नहीं है। मकसद है विभाजन के समय दसियों लाख हिंदू-सिखों का जो वीभत्स कत्ल ए आम पाकिस्तान ( उस समय के पूर्वी पाकिस्तान सहित) में हुआ वह इसी इस्लामी फितरत – धोखेबाजी, आतंक , अचानक हमले- के कारण ही हुआ । इस फितरत को उस समय के नेता गांधी , नेहरू नहीं समझ पाये। इनका मानना था कि विभाजन बाद वहां हिंदू सुरक्षित रहेंगे या सुरक्षित भारत आ सकेंगे। दोनों कई मामलों में अलग विचार रखने के बावजूद भी हिंदू विरोध में एक राय थे। दोनों ने त्यागी और संत की छवि बनाकर हिंदू भावनाओं को जीता था और फिर दोनों ने उनका भरपूर शोषण कर स्वयं को स्थापित किया। मुस्लिम लीग ने भी जब जनसंख्या के संपूर्ण अदला बदली की बात की तो इन दोनों ने इसे ठुकरा दिया। इसका नतीजा यह निकला कि पाकिस्तानी फौज,पुलिस और सरकारी अधिकारियों ने मिलकर हिंदु-सिखों का नरसंहार कराया। इसके विपरीत भारत में सेना और पुलिस ने मुसलमानों की ईमानदारी से सुरक्षा की।
पाकिस्तान में कैसा भीषण नरसंहार हुआ इसपर भारत सरकार ने 1948 में तथ्वान्वेषी संगठन बनाकर शरणार्थियों की आप बीती पर बयान दर्ज कराया। इन हृदय विदारक बयानों को जस्टिस गोपाल दास खोसला ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक ‘स्टर्न रेकनिंग’ में लिपिबध्द किया।जस्टिस खोसला उच्च न्यायालय में ‘गांधी मर्डर केस ‘ की सुनवाई में न्यायाधीश थे।इस पुस्तक में ‘गांधी मर्डर केस ‘ का विवरण देते हुये आपने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है:
“खचाखच भरे न्यायालय में नाथूराम गोडसे के बयान के बाद उपस्थित जनसमूह से यदि निर्णय देने को कहा जाता तो वे बहुमत से गोडसे को दोषमुक्त होने का निर्णय देते।”
इससे गांधी के विरूद्ध उस समय जनसमूह में असंतोष और रोष की झलक मिलती है।
अब प्रश्न उठता है कि क्या उस समय शीर्ष पर कोई भी ऐसा राजनेता नहीं था जिसे इस्लाम का गहन अध्ययन रहा हो और जो इसकी बताई गयी तीनों फितरतों से वाकिफ रहा हो ? डा. अंबेडकर ही ऐसे एकमात्र राजनेता थे जिन्हें पाकिस्तान में हिंदू सिखों के नरसंहार का यकीन था। इस खतरे को भांपकर ही उन्होंने 1940 पाकिस्तान के सवाल पर ‘ थौट्स औन पाकिस्तान ‘ नामक पुस्तक लिखी थी जिसका संशोधित संस्करण ‘पाकिस्तान और दि पार्टिशन औफ इडिया’ 1945 में प्रकाशित हुआ। जिसमें इस्लाम की रूपरेखा , सिध्दांत , इतिहास आदि पर व्यापक विचार किया गया था। उस समय ख्यात हिंदू नेताओं में एक मात्र डा. अंबेडकर ही थे जिनको सारी समस्याओं की समझ थी और उन्होंने स्पष्ट रूप से आबादी की संपूर्ण अदला-बदली की बात की थी।जनसंख्या की अदला-बदली का सवाल मुस्लिम पक्ष द्वारा उठाना वस्तुत: हिंदू हित की ही बात थी। पूरे हिंदू- सिख नेतृत्व द्वारा डा. अंबेडकर के सुझाव को नकारना मूर्खतापूर्ण निर्णय था। ये सब इस्लाम की फितरत से अनभिज्ञ थे। शीर्ष पर गांधी-नेहरू थे इसलिये अंबेडकर का सुझाव ठंडे बस्ते में चला गया जिसके फलस्वरूप पाकिस्तान में लाखों हिंदू-सिखों का नरसंहार तो हुआ ही भारत में ये सिरदर्द और ही बढ़ गया है।
इस मुद्दे पर उसी समय हिंदू नेताओं के ज्ञान और सूझबूझ की कमी पर निराश होकर डा. अंबेडकर ने टिप्पणी की थी :
” मैं अनुभव करता हूं कि जो हिंदूजन अपने बांधवों के भाग्य का पथ प्रदर्शन कर रहे हैं उनकी देखने में सक्षम आंख लुप्त हो गयी है और वे कुछ खोखले भ्रम जालों की चमक ओढ़े घूम रहे हैं , जिनके परिणाम , मुझे भय है, हिंदुओं के लिये घातक होंगे। हिंदू पक्ष से ऐसी बातें सुनकर आश्चर्य होता है। पता नहीं हिंदू बुध्दि इतनी मंद और शिथिल कैसे हो गयी है।”
डा. अंबेडकर की व्यक्त आंशंकायें सौ प्रतिशत सही सिध्द हुईं। लाखों लोगों की नृशंस हत्या , अकथनीय उत्पीड़न और अपमान के लिये जिन्ना , उसकी लीग और मुसलमानों के साथ ये हिंदू नेता भी उतने ही जिम्मेदार थे। हिंदुओं को शिक्षित , संगठित और शक्तिशाली बनाने की जगह परिस्थितियों की समझ और परिणाम के आकलन से बेखबर मनमौजी ढंग से पूरा नेतृत्व ही अहिंसा की नौटंकी करने में लगा था।
– देश विभाजन का खूनी इतिहास
( 1946-47 की क्रूरतम घटनाओं का संकलन)
लेखक:जस्टिस जी.डी.खोसला
हिंदी अनुवाद और समीक्षा: सच्चिदानंद चतुर्वेदी
( अरुण लवानिया)

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