गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

रंममंच की डोर खिंची तो, नाम सभी बदनाम मिले,
कुछ झंडों में छिपे हुए कुछ सिक्कों में नीलाम मिले।

थाम के उँगली हमने जिनकी, ईश्वर को पाना चाहा
उनके चर्चे, गली-गली में, कौड़ी-कौड़ी दाम मिले।

वतनफरोशों की आँखों में, झाँक रूह भी काँप उठी
एक तिरंगे के टुकड़े में, लिपटे रहमत-राम मिले।

प्यार-मोहब्बत,भाई-चारे की महँगी दुकानों पर
बड़े ही सस्ते खूनी खंजर नफरत के पैगाम मिले।

भक्त समझकर जब जा पहुँचे ,बहुरुपियों की बस्ती में
कंठीमाला हाथ में थामे , सौ-सौ आसाराम मिले।

नमकहलाली क्या होती है, उन्हें सिखाना बड़ा कठिन
जहाँ विभीषण की सूरत में, व्यक्ति नमकहराम मिले।

घर, मरघट को समझ के हमने, भूल बड़ी नादानी की
यहाँ ‘शरद’ से जानेवाले कहते ‘सत्य हैं राम’ मिले।

शरद सुनेरी