सामाजिक

लेख– दंगों के बीच इमाम ने पेश की इंसानियत की मिसाल

नाम संजय हो, राम हो या सलीम और रहीम। दोनों ईश्वर द्वारा निर्मित इस धरा की अनमोल धरोहर हैं। शरीर की बनावट अलग हो सकती है, लेकिन रगो में जो खून का कतरा एकसा बह रहा। फ़िर धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर हम एक-दूसरे का खून क्यों बहाते रहते हैं। धर्म के नाम पर खून बहाने की यह प्रथा कब बंद होगी। इसका उत्तर मिलना मुश्किल है, क्योंकि धार्मिक भावनाएं जो हमारे देश में बड़ी जल्दी आहत हो जाती हैं। बीते दिनों से बिहार और पश्चिम बंगाल जल रहा है, साम्प्रदायिक लपटों में। पर लोकतांत्रिक दुर्भाग्य तो देखिए। इस लपट से लोगों को बचाने की फ़िक्र करती लोकशाही व्यवस्था नहीं दिखती। वह तो मदमस्त है, आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में। अगर सत्ता का सेवक बेपरवाह हो गया, तो व्यवस्था चरमरा जाएगी। हो भी वहीं रहा। फ़िर ज़िक्र चाहें पश्चिम बंगाल का हो, या बिहार का। शुक्र हो, कि इस साम्प्रदायिक तपिश के बीच एक अच्छी ख़बर हमारे परिवेश में घटित हुई है। जिस पर समाज को आगे बढ़ना चाहिए। ख़बर यह है, कि जब बिहार और पश्चिम बंगाल में धार्मिक लपटें चरम पर हैं। उसी दरमियान आसनसोल से एक इमाम ने ऐसी मिसाल पेश की है, जो हरदिल की गहराइयों को छू लेने वाली है। दंगे की आग में अपने 16 वर्ष के बच्चें को खोने वाले इमाम इमदादुल रशीदी शांति दूत बनकर आएं।

उनके बेटे सबितुल्ला को पीट-पीटकर दंगाइयों ने जब मौत के घाट उतार दिया। उसके बाद भी इमाम अपने कलेजे पर पत्थर रखकर उग्र भीड़ को शांत करा रहें थे। तो क्या इमाम के इस कृत्य से हमारा समाज कुछ सीख लेगा। या फ़िर इमाम की इस आहुति को बिसार कर समाज पुनः धार्मिक कट्टरता के नाम पर खून बहाता रहेगा। इमाम ने शांति की अपील करते हुए कहा, कि अल्लाह ने हमारे बच्चें के लिए जितना वक़्त मुकर्रर किया था, उसने उतना वक़्त जी लिया। अब किसी ओर की जान धर्म के नाम पर न ली जाएं। इस्लाम शांति और सौहार्द्र का धर्म है। वह बदला लेने या हिंसा करने को बल नहीं प्रदान करता। यहां पर बात यह उभरती है, जब सभी धर्मों का सार एकसा है। फ़िर समाज राजनीति करने वालों की गिरफ्त में कैसे आ जाता है। क्यों राजनीति का धंधा करने वाले समाज को जलाने पर तुले रहते हैं। उनका चुनाव देश की उन्नति में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए होती है, समाज को धार्मिक आग में झोंकने के लिए नहीं। सियासतदां यह क्यों बिसार देते हैं।

इमाम ने देश के समक्ष मानवता की मिसाल पेश की है। दुर्भाग्य है, कि हम आज़ादी के सत्तर वर्ष बाद भी साम्प्रदायिक आग की लपटों से उभर नहीं पाए हैं। यह स्थिति उस वक़्त है, जब हम विश्वगुरु बनने की बात करते हैं। हमने दस्तक़ दूसरे ग्रहों तक दे दी है। फ़िर इन उन्नति के क़सीदे पढ़ने के क्या मायने। जब हम अपनी धरा पर ही आपसी भाई चारा औऱ सद्भाव के साथ जीवन निर्वाह नहीं कर पा रहें। अगर आज भी देश आज़ादी के वक़्त के दंगों से मुक्ति नहीं पा सका। फ़िर सभी विकास के तराने झूठे लगते हैं। अगर साम्प्रदायिक पागलपन को हम त्याग नहीं पा रहें, फ़िर हम किस बात पर अपने आप पर गर्व करते हैं। यह समझ नहीं आता। जब सामाजिकता की नींव ही कमज़ोर हो, फ़िर हम दूसरों का नेतृत्व कैसे कर सकते हैं। यहां एक बात समझना यह भी आवश्यक है, कि जब साम्प्रदायिक सोच को रखने वाले लोगों की तादाद सीमित होती है। फ़िर भी सामाजिक, साम्प्रदायिक विद्वेष विकराल रूप कैसे धारण कर लेता है। इसका उत्तर यह है, कि शांति की इच्छा रखने वाले बहुसंख्यक लोग मौन रहते हैं। इसके अलावा राजनीतिक शह भी तो समाज के उन लोगों की तरफ़ झुका दिखता है, जो समाज को धर्म, जाति के रूप में बटाने की कोशिश करते हैं।

अब जब उसी बंग भूमि से एक इमाम शांति का पैगाम लोगों को दे रहा, जहां से महात्मा गांधी ने आज़ादी मिलने के दौरान भड़की साम्प्रदायिक हिंसा को बुझाने के लिए अथक प्रयास किया था। तो यह उम्मीद बंधती हुई दीप्त होती है, कि सामाजिक समरसता इतनी जल्दी क्षीण नहीं होने वाली। हां एक बात ज़रूरी है, कि युवाओं का पग इस दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा। जिसे समय रहते रोकना होगा, नहीं तो साम्प्रदायिक उन्माद को रोकना मुश्किल होगा। इमाम की बातों पर समाज को गौर करना चाहिए, और उसे अपनाना भी चाहिए। इमाम ने धार्मिक उन्माद में मारे गए अपने पुत्र के सामने यह बात कही। अब हमारा पुत्र नहीं रहा। मैं नहीं चाहता कि अब कोई परिवार अपने किसी अजीज को खोए। मैं नहीं चाहता कि अब कोई ओर घर जले। तो इस आवाज़ को समाज के साथ रहनुमाई व्यवस्था को भी सुनना चाहिए, और अमल में लाना चाहिए। इमाम राशिद की बात करतें समय दिल्ली के यशपाल सक्सेना की चर्चा करना भी ज़रूरी बन जाता है। विगत फ़रवरी महीनें में अंकित की मौत को जब साम्प्रदायिक शक़्ल दी जा रहीं थी, तब अंकित के पिता ने कहा था, कि मैं सभी मीडिया चैनल्स और मीडिया हाउस से प्रार्थना करता हूँ, कि इस बात को हिन्दू-मुस्लिम डिबेट का हिस्सा न बनाएं। आख़िर जाति-धर्म के नाम पर मानवता का क़त्ल कब तक होता रहेगा। मानवता वैसे ही कमज़ोर हो रही, क्योंकि लोगों की सहनशक्ति जो कमज़ोर पड़ गई है। बात-बात में लोग उत्तेजित हो रहें। अगर ऐसा ही लगातार चलता रहा, तो हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब अतीत का हिस्सा मात्र बनकर रह जाएगी। समाज को इमाम जैसे लोगों की आवश्यकता है, समाज में आपसी प्रेम और सौहार्द को बनाए रखने के लिए। ऐसे विचार रखने वालों को समाज मे पूरी तवज्जों मिलनी चाहिए, तभी देश साम्प्रदयिक हिंसा से उभर सकता है। इसके अलावा रहनुमाई तंत्र को भी सामाजिक सद्भाव निर्मित करने की दिशा में आगे आना चाहिए।

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896