बस चुल्लू भर पानी ही रहा-

उलझी लटों की तरह, ए जिंदगी उलझ गई।
दम भरने को ठहरे तोे, ए जिंदगी फिसल गई।

अपने हाथों से ही अरमानों का गला, घोटना पडा।
मंजिल पर पहुंच कर, मुझकोे लौटना पडा
मुसलसल ठोकरे खाता रहा, फकत मेंरा दिल
मीठी मीठी आग लगी और, जिंदगी जल गई।।

सारे सावन बीत गये, इक बंूद को हम तरस गये।
प्यास मेंरी बुझा न सके, बादल जो सब बरस गये।
तैरने का इल्म न था, बस डूबते ही चले गये –
जब आरजू कोई न रही, तो लाश मेरी तैर गई।।

कुदरत का है खेल निराला, गुल भी सारे रोते हैं।
नीचे की पंखुडियां गिर जाती, फूल तब पूरे होते हैं।।
दुनियां ये बेकार ही है, सिंकदर भी कंगाल गया।
कहा सुई से खीसा बना दे, जालिम कफन सिल गई

कह दे कोई चरागों से, बेकार है उनकी शिखा।।
उजालों का अब काम नहीं, रहनुमा है बनीं निशा।।
सागर सब बेकार हुये, बस चुल्लू भर पानी ही रहा-
गले में क्या उतर गया, जिंदगी निकल गई।।

बीत गया बचपन सारा, जवानी भी सारी चली गई
पीछे मुड़कर देखा तो, कहानी भी सारी चली गई।।
कोई (राज) न तेरा समझ पाये, आखिर तू क्या चाह रही-
जिसके सहारे अब तक था, डाली भी ओ चली गई।

परिचय - राज कुमार तिवारी (राज)

संवाददाता बाराबंकी उत्तर प्रदेश मो० 9984172782 इनका जन्म बाराबंकी जिले के जयचन्द्रपुर गांव के एक किसान के घर 1988 में हुआ था। इन्होने शिक्षा शास्त्र से परास्नाक की उपाधि प्राप्त की। इनको बचपन से ही लिखने का बड़ा ही शौख था, 15 वर्ष की आयु से ही इन्होने लिखना शुरू कर दिया था। 1998 से 2014 तक दूर दर्शन केन्द्र की मासिक पत्रिका से व लखनऊ से प्रकाशित होनेे वाली अन्य प्रत्रिका व समाचार पत्रों में भी स्थान प्राप्त किया। इनका कलम चलाने का सिलसिला अभी जारी है।