लेख– बोया पेड़ बबूल का, फ़िर आम कहाँ से होय।

काफ़ी प्रचलित कहावत है जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। फ़िर विपक्ष द्वारा संसद न चलने दिए जाने पर सत्ता पक्ष का उपवास रखना शायद अपने-आप को राजनीतिक रूप से पवित्र दिखाने से अधिक समझ नहीं आता, क्योंकि उपवास एक पवित्र शब्द है। जिसके बहाने सत्ताधारी दल अपने पिछले चार वर्ष के राजनीतिक पाप धुलकर 2019 के चुनाव में जाने की तैयारी कर रहा है। उपवास संसद न चलने दिए जाने के कारण रखा गया। इसका औचित्य इसलिए समझ नहीं आता, क्योंकि राजनीतिक राजधर्म को निभाने और अपने वादे को जुमला तो सरकारी तंत्र के सिपहसलारों ने ख़ुद करार दिया है। वैसे देखा जाएं, तो आज सत्ता में रहते हुए जो भाजपा विपक्ष द्वारा संसद न चलने दिए जाने पर उपवास रखकर अपनी राजनीतिक और सामाजिक जिम्मदारियों से मुंह मोड़ रही है। विपक्ष में रहते हुए उसका इतिहास भी पाक-साफ़ नहीं रहा है। विपक्ष में रहते हुए भारतीय जनता पार्टी ने जैसा गैर-जिम्मेदाराना, अमर्यादित और अलोकतांत्रिक आचरण किया था । साथ में संसद न चलने देने को बाकायदा अपनी घोषित नीति बना लिया था। अब उसे उसी का फल भोगना पड़ रहा है, क्योंकि कहा गया है। जब बोया पेड़ बबूल का फ़िर आम कहाँ से होय।

पर संसदीय लोकतंत्र की यह विशेष ख़ासियत रहीं है विपक्ष में रह कर जो काम किया जाता है, सत्ता में आते ही उसी की आलोचना की जाती है। इसके विपरीत अगर बात करें कि सत्ता पक्ष के जिस काम की विपक्ष आलोचना करता है, सत्ता में आते ही वह वही काम करने लगता है जिसकी कल तक वह आलोचना कर रहा था। यह भारतीय लोकतंत्र का कटु सत्य उभर कर हमारे सामने पिछले कुछ वर्षों में आया है। आज के दौर में प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष को याद दिलाते हैं, कि संसद को चलाना सरकार और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन जब भाजपा विपक्ष में थी तो उसके शीर्ष नेता संसद चलाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की बताया करते थे। यही नहीं, किसी भी घोटाले की जरा-सी भी भनक पड़ते ही वे तत्काल संबंधित मंत्री की ही नहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की भी मांग करते थे। फ़िर आज के दौर में विपक्ष संसद चलने देने पर सत्ता पक्ष का सहयोग कैसे कर सकता है। उपवास महात्मा गांधी ने भी 17 बार किया था, लेकिन उनके उपवास का उद्देश्य सिर्फ़ जनहितकारी नीतियों को लागू कराने और समाज को नई दिशा देने के लिए था। पर आज़ादी में पहली बार ऐसा हो रहा है, कि प्रधानमंत्री उपवास राजनीतिक स्वार्थ के लिए कर रहा है।

जिस हिसाब से देश में स्थितियां निर्मित हो रहीं है, शायद उससे निपटने की फ़िक्र किसी को नहीं है। दोनों केंद्रीय सत्ता पर काबिज़ रह चुके दल सिर्फ़ उपवास के नाम पर 2019 की बिसात साधने की कोशिश में नज़र आ रहें हैं। विपक्ष ने भी उपवास किया, भले ही छोले-भटूरे खाकर किया। पर नाम दिया दलितों के हक के लिए उपवास रखा गया। सत्ता पक्ष ने उपवास रखा, तो कहा संसद ठप्प होने के कारण उपवास रखा गया। ऐसे उपवास से देश और समाज को कोई फ़ायदा होने वाला नहीं। आज देश की स्थिति ऐसी हो गई है, कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी तरीक़े की व्यवस्थाएं चरमराई हुई लग रहीं हैं। फ़िर उपवास कोई सियासतदां इसलिए क्यों नहीं रखता, कि अन्नदाता मरने को विवश न हो। युवा रोजगार न मिलने के कारण न मरे इसके लिए कोई उपवास क्यों नहीं रखता। पिछले कुछ वर्षों के इतिहास के पन्ने पलटकर देखा जाए, तो सरकारें किसी दल की हो, मर आम आदमी ही रहा। देश में हर दो घण्टे में एक किसान खुदकुशी कर रहा है। एक आँकड़े के मुताबिक 2016 में महाराष्ट्र में खेती से ज़ुड़े 3661 किसान ने आत्महत्या की। तो वहीं पूरे देश में पिछले पंद्रह वर्षों में 2 लाख 35 हज़ार के करीब किसानों ने आत्महत्या की। साथ में बेरोजगार 1 लाख पैतालीस हजार के क़रीब युवाओं ने भी आत्महत्या की।

प्रदूषण से दो घण्टे में देश के भीतर एक मौत हो रहीं है। 45 फ़ीसद छात्र आठवीं से ज्यादा देश में पढ़ नहीं पाते। पीने का साफ़ पानी न मिलने से हर घण्टे देश में एक मौत हो रही। दो वक़्त की रोटी देश के करोड़ों लोगों को नसीब हो नहीं पा रहीं। फ़िर इसलिए किसी दल के लोग उपवास क्यों नहीं रखते कि दो वक्त की रोटी लोगों को मिल सकें। देश की ऐसी स्थिति देखकर लगता तो यहीं है, यह समय राजघाट पर बैठकर राम धुन सुनने लायक़ तो नहीं। अगर राजनीति में आने के बाद सियासतदानों की कुछ समाज, देश के प्रति जिम्मेदारी बनती है। तो उसे निभाने की दिशा में क़दम बढ़ाना चाहिए, न कि हर वक्त सिर्फ़ देश को चुनावी मूड में घसीटने और कुर्सी की फ़िक्र सियासतदां को होनी चाहिए। आज हमारे देश की दोनों संसद को मिलाकर देश में 612 सांसद करोड़पति हैं। इसके साथ संसद की कैंटीन में सबसे सस्ता भोजन मिलता है। साथ में हर वर्ष सांसद निधि का पांच करोड़ सांसद कर्ज़ कर नहीं पाते। वर्तमान दौर में 80 फ़ीसद सांसद एक गांव गोद लेने की स्थिति में नहीं हैं। इन सब के इतर सांसदों की सुरक्षा में इस देश का सबसे ज़्यादा धन ख़र्च होता है। फ़िर भी संसद अगर जनमहत्व के विषयों पर लड़खड़ा रही। तो दोष किसी एक दल का नहीं। इसके लिए उत्तरदायी सभी दल के राजनेता है। उन्हें अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए, और अपना विकास करने से पहले समाज को विकसित और सम्पन्न बनाने के बारे में सोचना चाहिए। साथ में लोकतंत्र में जिम्मेदारी से मुक्त कोई दल नहीं, चाहें पक्ष हो, या विपक्ष। सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए। तभी लोकतंत्र मजबूत बन सकता है।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896