अजन्मी बेटी की गुहार

इक मेरी विनती सुन लो बाबा
मुझे जन्म मत दीजो ।
मार देना मुझे कोख में ।
वो पीड़ा कम है
जीने से… तेरे निर्मम संसार में।

अगर जन्म दिया तो सक्षम भी बनाना ।
ताकि निपट सकूं दुराचार से….. ।

अब समझ आया ।
क्यूं दादी छाती पीटती थी मेरे जन्म पे।
क्यू नमक मुंह मे भरकर मार देती थी ।
माँ की गोद में… ।

बरी हो जाती थी वोह हर उस दुख से ।
जो सालता उसे
लुटने से मेरे, तेरे पाशविक संसार में ।

बहुत कोशिश की मैनें।
धरा पर अपने पाँव जमाने के।
पर… पहुंचा दिया इन दरिंदों ने।
फिर से मुझे उसी हाल में ।

कल फिर से सुना फुसफुसाते हुए।
दादी कह रही थी तुम्हें ।
कैसे भी… एक टैस्ट करवा ले कहीं से?
बेटी हो गई तो भोगेगा… तकलीफ़ बड़ी।
कुछ ले देकर निपटा आना केस वही ।

यह सही भी तो है….
यह धरा मेरे लायक अब रही भी तो नहीं ।
हो जाने दो इसे स्त्री विहीन ।
बन जाने दो ….शमशान ।
रुक जाने दो सृष्टि का चक्र ।
बस अब दंड़ है इनका यही ।
दंड़ है, यही…. ।
विजेता सूरी, रमण।
16.4.2018

परिचय - विजयता सूरी

निवासी जम्मू, पति- श्री रमण कुमार सूरी, दो पुत्र पुष्प और चैतन्य। जन्म दिल्ली में, शिक्षा जम्मू में, एम.ए. हिन्दी, पुस्तकालय विज्ञान में स्नातक उपाधि, वर्तमान में गृहिणी, रेडियो पर कार्यक्रम, समाचार पत्रों में भी लेख प्रकाशित।