लघुकथा – प्रेम का आगोश

दिन भर की भागदौड , बच्चों के नखरे ,पति की शिकायतों, सास के उलाहने में ही सारा दिन निकल जाता। इन सबमें उसकी मानसिक हालत कमजोर हो जाती, मन करता सब छोड भाग जाये। रोज की तरह आज भी वह ये सब झेल रही थी, चारों तरफ एक अजीब सा शोर मचा हुआ था। सब अपने आप में मस्त उसकी कोई न सुनने बाला, पति भी अपनी कहता पर सुनता नही ।
चारों तरफ की भीड में वह अकेली बैचैन खडी थी तभी एक साया उसकी तरफ बढा- “यू उदास मत होया करो , तुम थक गई हो न …मेरे कान्धे पर सर रखकर सब भूल जाऔ , सारी परेशानियां,उदासी मुझे दे दो  ,मेरा भी हक है इस पर …आखिर प्रेम हूँ मैं तुम्हारा “
एक ऐसा प्रेम जिसको छू नही सकती वह ,पर खुशबू महसूस कर सकती है ..लेकर आगोश में उसे ,सो गई नई सुबह के लिये।
— रजनी चतुर्वेदी

परिचय - रजनी विलगैयाँ

शिक्षा : पोस्ट ग्रेजुएट कामर्स, गृहणी पति व्यवसायी है, तीन बेटियां एक बेटा, निवास : बीना, जिला सागर