समिति के सार्थक सुझाव

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक अपने दायित्वों के निर्वाह में न केवल सजग रहते है , बल्कि वह नए कदम भी उठाते है। इनका प्रभाव संबंधित क्षेत्र में दिखाई देता है।  राज्यपाल के रूप में वह उत्तर प्रदेश के अट्ठाइस विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी है। इस रूप में उन्होंने अब तक अनेक उल्लेखनीय कार्य और सुधार किए है। जिसके चलते विश्वविद्यालयों के सत्र नियमित हुए। प्रत्येक विश्वविद्यालयों में नियमित दीक्षांत समारोह होने लगे। इसमें भारतीय परिवेश को अपनाने का आग्रह किया गया। सभी  विश्वविद्यालय इस पर अमल कर रहे है। दीक्षांत समारोह में अंग्रेजों के समय से चले आ रहे ड्रेस कोड का परित्याग किया गया। विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया को लागू किया गया।
              इस दिशा में  और भी सुधार के मद्देनजर कुलाधिपति ने विश्वविद्यालय प्रबंधन अध्ययन दल का गठन किया था। उसकी रिपोर्ट  उन्होंने मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक की । राम नाईक ने इसकी भी वजह बताई। उनके अनुसार शिक्षा में सुधार हेतु सभी लोगों को अपने स्तर से सहयोग करना चाहिए। इसमें केवल सरकार , कुलाधिपति ,कुलपति , आदि ही नहीं समाज , शिक्षाविद , अभिवावक ,आदि सभी का सकारात्मक सहयोग होना चाहिए। उन्होंने इसके लिए सभी संबंधित लोगों का आह्वान भी किया। इसके पहले भी राम नाईक सुधार की दृष्टि से एक समिति बना चुके है। उन्हें लगा कि बदलते परिवेश में विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के कई प्रावधान सामयिक नहीं रह गए है। उनकी सलाह पर राज्य सरकार ने राज्यपाल के
 विधिक परामर्शदाता  एस0एस0 उपाध्याय की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था ।  उक्त समिति द्वारा अपनी तीन रिपोर्टें प्रस्तुत की गयी हैं। समिति की संस्तुतियाँ को राज्य सरकार को प्रेषित किया गया है, जो विचाराधीन हैं।
इसके अलावा परीक्षाओं की प्रक्रिया एवं पद्धति के बारे में मूल्यांकन हेतु  जनवरी, दो हजार पन्द्रह  को प्रो0 मुज्जम्मिल  तथा प्रो0 जे0वी0 वैशम्पायन की एक समिति का गठन किया गया था।इसकी रिपोर्ट  मुख्यमंत्री के विचारार्थ प्रेषित कर दी गई है। समय-समय पर कुलपति सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा के उपरान्त निर्णय लिए गए। इन सम्मेलनों का आयोजन राजभवन लखनऊ के अतिरिक्त जौनपुर, झाँसी तथा कानपुर विश्वविद्यालयों में भी किया गया।
 राम नाईक ने अनुभव किया कि उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा-68 तथा अन्य विश्वविद्यालयों के अधिनियमों की सुसंगत धाराओं के अधीन प्रस्तुत की गई अपीलों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी हो रही है । इनके अध्ययन , विचार विमर्श, निस्तारण, समाधान, दिशा निर्देश आदि से संबंधित सम्यक नीति की आवश्यकता थी। अन्य राज्यों की व्यवस्था का भी लाभ लेने के विषय में भी विचार किया गया। इस परिप्रेक्ष्य में राज्यपाल की प्रमुख सचिव सुश्री जूथिका पाटणकर के नेतृत्व में समिति गठित की गई। इस समिति ने चार राज्यो,प.बंगाल,महाराष्ट्र ,तमिलनाडु, गुजरात  की व्यवस्था का अध्ययन किया।  इसके आधार पर एक तुलनात्मक रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी गई। राज्यपाल ने इसे सार्वजनिक किया।
विश्वविद्यालय संबंधी विवादों के निस्तारण हेतु स्थापित  अपीलीय प्रक्रिया ,कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया, कुलपति की सेवा शर्तें , विश्वविद्यालय में अधिकारियों की नियुक्ति के प्रावधान,रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया, कुलाधिपति कार्यालय-शासन-विश्वविद्यालयों के मध्य  परस्पर सामंजस्य का स्तर , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा पारित विनियमों का अंगीकरण, परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली ,ई प्रक्रिया का अंगीकरण आदि विषयों  पर सुझाव दिए गए है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों की प्रबंध प्रणाली को सुधारने के निमित्त कुछ सुझाव एवं संस्तुतियाँ दी गई हैं।
उल्लेखनीय है कि कुछ सुझावों का कार्यान्वयन अधिनियम में संशोधन के उपरान्त ही हो सकेगा। परन्तु कुछ संस्तुतियाँ प्रशासनिक स्वरूप की हैं जिनको अमल में लाने के लिए मात्र शासनादेश की ही आवश्यकता होगी। विश्वविद्यालय के विवादों के निस्तारण हेतु न्यायाधिकरण की स्थापना की जाए अथवा कुलाधिपति कार्यालय को अधिक सशक्त बनाने की भी बात रखी गई। कुलपति पद की शैक्षिक अर्हताओं, शोध, शैक्षिक एवं प्रशासनिक  अनुभव का प्रावधान अधिनियम में किया जाए। उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के तहत कुलपति की खोज हेतु गठित की जाने वाली खोज समिति के सदस्यों की अर्हताओं का उल्लेख हो तथा यथासम्भव शिक्षा के क्षेत्र में योगदान करने वाला प्रख्यात शिक्षाविद हो, ताकि सुयोग्य महानुभाव का कुलपति पद के लिए चयन किया जाना सम्भव हो सके। पारदर्शिता के उद्देश्य से खोज समिति द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तथा इसकी समय सीमा का प्रावधान संबंधित अधिनियम में किया जाए।

 

 

 

कुलपति पद की सेवा शर्तें यथा अवकाश, भ्रमण तथा उनके विरूद्ध की जानी वाली अनुशासनात्मक कार्यवाही की प्रक्रिया का प्रावधान किया जाए।  कुलपति द्वारा सम्पादित कार्यांे के मूल्यांकन की प्रक्रिया स्थापित कीजाए। विश्वविद्यालय अधिकारियो जैसे -कुलसचिव, वित्त नियंत्रक व वित्त अधिकारी, परीक्षा नियंत्रक आदि महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति का अधिकार प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए कुलपति को दिया जाए अथवा नियत समय के लिए कुलपति की सहमति से शासन द्वारा नियुक्ति की जाए। विश्वविद्यालयीन प्रशासनिक मुद्दों में यथासम्भव शासन का हस्तक्षेप सीमित हो एवं सरकार एक सुविधाकर्ता की भूमिका में रहे।इस माध्यम से  विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को सुनिश्चित किया जा सके।

 

स्ववित्तपोषित कार्यक्रमों के तहत नियुक्त शैक्षिक एवं गैरशैक्षिक कर्मियों की सेवा शर्तों को विश्वविद्यालय अधिनियम एवं परिनियमों का अंग बनाया जाए। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा पारित विनियमों का अंगीकरण प्राथमिकता पर किया जाए, ताकि शिक्षकों की नियुक्ति एवं प्रोन्नति संबंधी विवादों को नियंत्रित किया जा सके।
पारदर्शी कार्यप्रणाली बनाने के लिए प्रवेश से लेकर उपाधि प्रदान करने तक की सम्पूर्ण प्रक्रिया को आॅनलाइन किया जाए। नैक मूल्यांकन को आवश्यक किया जाए तथा शासन से वित्तीय सहायता की निरन्तरता के लिए इसे अनिवार्य किया जाए। कार्य परिषद् एवं विश्वविद्यालय सभा में नामित किए जाने वाले जनप्रतिनिधि शिक्षा के क्षेत्र से संबंध रखने वाले हों। कार्य परिषद् या प्रबंध मण्डल एवं विश्वविद्यालय सभा की बैठकों में नामित प्रतिनिधि स्वयं अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करें, ताकि इन बैठकों के निर्णयों की सार्थकता रहे और प्रकरणों का निस्तारण यथाशीघ्र हो सके।
शिक्षा की गुणवत्ता हेतु शोध कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाए तथा राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों के साथ अनुबन्ध स्थापित किए जाए।  शिक्षा की गुणवत्ता हेतु शोध कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाए तथा राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों के साथ अनुबन्ध स्थापित किए जाए।
             जाहिर है को राम नाईक कुलाधिपति के दायित्वों का  भी बखूबी निर्वाह करते है। उनके प्रयास से उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा में अनेक सुधार हुए है। कुलपतियों के सम्मेलन , विभिन्न समितियों के माध्यम से भी उन्होंने समस्याओं की जानकारी हासिल की है। इसमें जिन समस्याओं का समाधान उनके स्तर से संभव था, उसमें राम नाईक ने कसर नहीं छोड़ी इसके अलावा उन्होंने समितियों के सुझाव सरकार को प्रेषित कर दिए है। वर्तमान सरकार उनके सुझावों को गंभीरता से लेती है ।ऐसे में उम्मीद करनी चाहिए कि निकट भविष्य में सुधार दिखाई देंगे।
—  डॉ दिलीप अग्निहोत्री

परिचय - डॉ दिलीप अग्निहोत्री

लखनऊ मो.- 9450126141