Monthly Archives: April 2018

  • जख्म गैरों के जाकर

    जख्म गैरों के जाकर

    गजल : कुमार अरविन्द गैर के जख्मो को हर रोज सुखाते रहिये | अपने किरदार का किरदार निभाते रहिये | राब्ता ही न रहा मुझसे तो शिकवा कैसा | करके बर्बाद मुझे ज़श्न मनाते रहिये |...

  • मदद

    मदद

    आज एक समाचार पढ़ा- कन्नौज: काली नदी में डूब रहा था दोस्त, बचाने पहुंचे तो चारों की हुई मौत इस समाचार ने मुझे 15 साल पहले का किस्सा याद दिला दिया. एक शनिवार के दिन हमारे...

  • राम और रहीम

    राम और रहीम

    दहकती धरती को देखकर, लाशों के ढेर की गिनती करते रो रहे है, राम और रहीम कल अचानक बवाल उठा, बिच चौराहे पर लड़ पड़े दो इंसान, भीड़ की संख्या बढ़ने लगी जनता दो धड़ो में...

  • कविता

    कविता

    मदहोशी का आलम छा रहा है, दिल के दरिया में भूचाल आ रहा है! हमारी हस्ती कुछ भी नही, फिर जाने क्यों तलबगारो का सैलाब आ रहा है? मैं डूब रहा हूँ शब्दों की गहराई में,...


  • कविता – मानवता का अंत

    कविता – मानवता का अंत

    ये क्या हो रहा है आज मिला हमें कैसा यह ताज इंसानी पाश का खंडन कर जाती,धर्म,सम्प्रदाय में विखंडित कर तरुणियों की शुचिता का दमन किया हाय रे इंसान! फिर से तूने मानवता का अंत किया।...


  • लघुकथा – देशप्रेम

    लघुकथा – देशप्रेम

    चुनाव के आसपास होने वाली रैली किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होती । कार्यक्रम से घर लौटे नेताजी बहुत खुश थे। आज की रैली में बहुत भीड़ थी। राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के समक्ष, उनका...

  • कविता

    कविता

    चलो कुछ इस तरह हम समझौता कर लेते हैं हर चीज को जातियों में बांट लेते हैं खुद को अपनी जातियों तक सीमित कर देते हैं जो जिस जाति का है उसका उसी जाति का डॉक्टर...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    गुलशन में गुल महकते रहेंगे है साथ उनका संभलते रहेंगे असर दुआओं में भर लो इतना हादसे खुद ब खुद टलते रहेंगे पाना ही नहीं जिन्दगी का मकसद नए ख्वाब दिलों में मचलते रहेंगे कर ले...