चुनौती

इस शुक्रवार को राणा जी की नई फिल्म रिलीज हुई थी- ”राणा जी री मूछां”.

फिल्म लगते ही हिट होने की राह पर थी. राणा जी बहुत खुश भी थे, मस्त और व्यस्त भी. बधाइयां देने वालों का तांता लगा हुआ था, सब राणा जी की लम्बी मूछों की तारीफ करते नहीं थकते थे. बीच-बीच में राणा जी मूछों पर ताव देते दिखाई पड़ रहे थे. तनिक एकांत मिलते ही वे उस दिन की स्मृति में खो जाते, जिस दिन उन्हें ठाकुर जी द्वारा चुनौती मिली थी.

”राणा जी, थारी मुछी मां मलाई.” ठाकुर जी ने चुटकी ली.
”मलाई की तो भली कही, पण चंगी-भली मूछां नें मुछी किंवें कहे सै?” राणा जी गरजे.
”ये भी कोई मूछां सै, मूछां हों तो रावत जी जैसी.” ठाकुर जी ने अपनी मूछों को ताव देते हुए कहा.
”तू मनैं चुनौती दे रहा सै काईं?” राणा जी गरजे.
”ठीक समझया भाया.” ठाकुर जी ने कहा.
”ठीक सै, थारे घर सूं रोज भैंस के दूध की मलाई आवेगी, म्हारी मुछी लाम्बी-लाम्बी मूछां बन जावेगी.” राणा जी ने हंसते हुए कहा. 
”पक्का-पक्का, राम-राम भाया.” ठाकुर जी तो चल दिए, लेकिन राणा जी को मुछी को मूछां बनाने की चुनौती दे गए थे. तब से ठाकुर जी के घर से रोज मलाई आती थी और राणा जी कुछ मलाई खाते, कुछ मूछों पर लगाकर उनको बटते. मूछें लम्बी होती गईं, चौपाल में अब इन्हीं मूछों की चर्चा होती थी. चर्चा दूर-दूर तक पहुंची और राणा जी नाटक-नौटंकी की सीढ़ियों को पार करते हुए फिल्मों तक पहुंच गए. कभी-कभी ये लाम्बी-लाम्बी मूछें ही फांसी का फंदा बनाकर दिखाने के काम भी आती थीं.
यह सब लम्बी मूछों की चुनौती का प्रताप ही तो था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।