दारी

दारी, तांगे वाले को हमारे गाँव के सभी लोग जानते थे। जब पहली दफा हमारे गाँव से शहर को सड़क बनी थी तो उस वक्त अभी कोई बस नहीं होती थी। यह दारी ही था जिस ने अपना तांगा इस सड़क पर चलाना शुरू किया था। जो लोग, औरतें और मर्द साइकल नहीं चला सकते थे उन के लिए दारी का तांगा एक वरदान साबत हुआ था। जब मैं पहली दफा इंग्लैंड से गाँव आया तो मेरी माँ एक दिन दारी के तांगे में बैठ कर शहर चले गई और बहुत सा घर के लिए सौदा ले कर आई। मैं कुछ हैरान हो गया कि मेरी माँ तो कभी गाँव के दूसरे मोहल्ले में भी जाती नहीं थी और अब वोह दारी के तांगे में बैठ कर शहर जाती है। जब मैंने माँ से पुछा तो वोह हंस कर बोली, ” यह दारी ने तो शहर जाना बहुत आसान कर दिया है और मेरे जैसी और भी बहुत औरतों से दारी का तांगा हर वक्त भरा रहता है।
एक दिन मैं भी दारी के तांगे में बैठ गया। मैंने दारी को ध्यान से देखा, जब मैंने भारत छोड़ा था तो दारी उस वक्त मुझ से चार पांच साल छोटा ही होगा लेकिन अब तो बहुत बड़ा हो गया था। तांगे में बैठते ही दारी ने मुझे सत श्री अकाल बोला और बोला” भा जी ,विलायत से कब आये “, ” अभी एक हफ्ता ही हुआ है, सोचा आज मैं भी तुम्हारे तांगे की सवारी कर लूँ ” मैंने हंस कर जवाब दिया। यूँ तो दारी को मैं जानता ही था लेकिन गाँव में रहते दारी से कम ही मुलाकात हुई थी। इस छोटी सी बात से हमारी समझो दोस्ती हो गई। दारी से तो किया मुझे तांगों से ही दोस्ती हो गई। इस के बाद टैम्पू आये बसें आईं लेकिन जब भी मैं गाँव आता, मैं दारी के तांगे में ही शहर जाता। तांगे से मुझे एक इशक सा हो गया था। कारण यह ही था कि तांगा धीरे धीरे चलता था । घोड़ी के पैरों की थप्प थप्प और साथ में बैठे लोगों से बात करना मुझे बहुत अच्छा लगता था। गाँव के सभी लोग तो मुझे जानते ही थे, इस लिए जब भी मैं तांगे में सवार होता, नए नए लोगों से मुलाक़ात होती। अगर कोई न भी बुलाता , मैं खुद उस को बुला लेता। वोह मुझे बिदेस के बारे में पूछते और मैं उन को जवाब देता। कभी कभी मैं गाँव के पुराने बज़ुर्गों के बारे में पूछता तो उन में कोई होता कोई नहीं। पुरानी बातें करके मैं उन से हंसी मज़ाक भी कर लेता। लोग मुझे कहते कि किसी दिन मैं उन के घर आऊं और मैं भी वादा कर देता की मैं जरूर आऊंगा। दारी भी बहुत बातें करता था और हर बार मुझे कहता, ” हमारे घर भी किसी दिन जरूर आना भा जी ” और मैं भी वादा कर देता कि जरूर आऊंगा। दारी का तांगा इतना अच्छा नहीं था। काफी सीटों का कवर जगह जगह फटा हुआ था। तांगा बहुत ही पुराना मालूम होता था। जगह जगह रिपेयर की गई थी। पिछली सीट के नीचे दारी ने घोड़ी के लिए चारा रखा हुआ होता था। तांगा हमेशा भरा हुआ होता था और दो आदमी पिछली ओर पायदानों पर खड़े होते थे। रास्ते में कोई खड़ा हो तो वोह किसी को निराश न करता। ज़रा इधर सरक जाना बहन जी, कह कर स्वारिओं को सिकोड़ देता और एक और सवारी चढ़ जाती। तांगे में बैठ कर स्वारिओं की बातों का मज़ा लेना ही मेरा तांगे से एक इशक सा हो जाना था। दारी की घोड़ी बहुत साफ़ सुथरी होती थी शायद वोह हर रोज़ घोड़ी के सारे शरीर को साफ़ करता था।
एक दिन जब मैंने शहर से दारी के तांगे में बैठा तो किराया देने के लिए बटुआ खोला तो उस में एक पांच सौ रूपये का नोट ही था जबकि किराया सिर्फ पांच रूपये था। मैंने दारी को बोला, ” यार ! बड़ा नोट है, पैसे फिर दे दूंगा “, किया करते हो भा जी, फिर दे देना। बात गई आई हो गई। दो तीन दिन के बाद शाम को एक दिन मैं दारी के घर पांच रूपये देने चला गया। पहली दफा दारी का घर देखा था और मुझे हर तरफ गरीबी झलकती नज़र आ रही थी। उस की पत्नी मक्की की रोटीआं पका रही थी। उस ने मुझे देख कर मुझे हंस कर सत श्री अकाल बोला। मन खुश हो गया क्योंकि दारी की पत्नी हंसमुख थी। उन के दो बेटे अपने स्कूल का काम कर रहे थे। मैंने बीस रूपये का नोट दारी को दिया तो वोह जेब से पैसे निकाल कर बाकी पैसे देने लगा तो मैंने कहा, ” दारी रख लो यह सारे पैसे ! ” दारी ने जबरदस्ती मेरे हाथ में पंद्रह रूपये थमा दिए और बोला, ” ऐसे तो मुझे आदत पढ़ जायेगी और यह मेरे लिए बुरी बात होगी “, मुझे दारी की इस बात ने उस के लिए इज़त बढ़ा दी। उस वक्त आम लोग चर्मकारों के घर का कुछ खाते पीते नहीं थे और दारी चर्मकार था। दारी की पत्नी को मैं बोला, ” भाबी ! आप की कड़ाही में पढ़ा तड़के वाला साग और मक्की की रोटी देख कर मुंह में पानी आ रहा है। किया मुझे रोटी खिलाओगी? किया तुम हमारे घर का खाओगे ? वोह बोली। मैंने कहा भाबी ! अब बहानेबाज़ी न कर और रोटी के ऊपर साग डाल कर मुझे दे दे। रोटी मैंने खा ली और इस के बाद हमारा रिश्ता गहरा हो गया। कई वर्षों बाद दुसरी दफा जब मैं गाँव आया तो दारी ने टैम्पू ले लिया था। उस ने बताया कि उस की घोड़ी मर गई थी और क्योंकि एक टैम्पू सड़क पर चल रहा था तो उस ने भी सोच कर टैम्पू ही ले लिया था। उस के बेटे अब हाई स्कूल में पढ़ते थे और पढ़ने बहुत हुशिआर थे। रात के वक्त मैं दारी के घर चला जाता था। दारी अक्सर एक ही बात करता था कि उस के बेटे पढ़ जाएँ और घर की गरीबी दूर हो जाए। मैंने दारी को मदद के लिए पैसे देने चाहे लेकिन उस ने यह कह कर नहीं लिए कि वोह अपनी कमाई पर ही बच्चों को पढ़ायेगा। अगर मदद की जरूरत हुई तो वोह पहले मुझे ही खत डालेगा। दारी के लिए मेरे मन में इज़त बहुत बढ़ गई थी। सोचता था कि इस कलयुग के ज़माने कौन ऐसा होगा जो मुफ्त के पैसे ठुकरा देगा और फिर एक गरीब टैम्पू वाला !
इस मुलाकात के बाद बहुत साल हो गए, मैं गाँव जा नहीं सका। जब आया तो गांव बहुत बदल चुक्का था। सड़क पर अब ना तो कोई तांगा था, ना ही टैम्पू। आधे आधे घंटे बाद बस आती। बड़ी बड़ी कोठीआं बन गई थीं। एक शाम को मैं दारी को मिलने चल पढ़ा। रास्ते में कुछ लोग मिले जिन्होंने दारी के बारे में बहुत कुछ बताया कि उस की पत्नी की मृत्यु हो चुक्की थी और दोनों बेटे अमरीका में रहते हैं और दारी अकेला रहता है। जब मैं दारी के घर गया तो घर अब काफी बढ़िया था और दारी बैठा टीवी देख रहा था। मुझे देखते ही उठ खड़ा हुआ और मेरे गले लग गया।सरसरी बातों के बाद दारी को मैंने उस की बीवी के बारे में पुछा तो वोह गमगीन सा हो गिया और बताया की पत्नी को अचानक दिल का दौरा पढ़ गिया और कुछ ही मिनटों में भगवान् के घर चले गई। फिर मैंने उस के बेटों के बारे में पूछा तो उस ने एक ठंडी आह भरी और बोला, ” दोनों बेटे पढ़ने में बहुत हुशिआर थे, वोह आगे पढ़ना चाहते थे लेकिन इतने पैसे मेरे पास न थे, उन को मैंने यह ही कहा था कि कोई नौकरी ढूँढ लो लेकिन एक दिन जब वोह घर आये तो जो उन्होंने मुझ से बोला, मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई, उन्होंने धर्म परिवरन कर लिया था, वोह ईसाई बन गए थे, जब मैंने पूछा तो बच्चे कहने लगे कि चर्च वाले उन की पढ़ाई का सारा खर्च करेंगे, मैंने बहुत जोर दिया कि वे अपना धर्म नहीं छोड़ें लेकिन वोह माने नहीं, कहने लगे अपने धर्म को हम ने चाटना है, किसी गुरदुआरे मंदिर वालों ने मदद नहीं की, की तो सिर्फ चर्च वालों ने, जवान बच्चों के आगे मैं हार गया, अब वोह पढ़ लिख कर अमरीका चले गए हैं और वहीँ शादीआं भी करा लीं है “, मैंने पूछा, तो तुम को अपने पास नहीं बुलाते ? वोह आते जाते रहते हैं और मुझे अपने पास ले जाने को बोलते हैं, दारी ने जवाब दिया। तो फिर तुम चले क्यों नहीं जाते, मैंने पूछा। भा जी जब धर्म ही चले गया तो अब मेरे पास किया रह गया, पैसे का किया, आज है कल नहीं लेकिन धर्म चले गया तो कुछ भी नहीं। गुज़ारा तो हमारा तब भी होता था जब मैं तांगा चलाता था। तब हम खुश थे लेकिन अब नहीं, अपने बाप को छोड़ कर दूसरे के बाप को बाप कहूं, यह मुझे मंज़ूर नहीं। दारी की आँखों में नमी थी।
और बातें करने के बाद मैं वापस घर आ गया। बहुत वर्ष बीत गए और परिवार के साथ फिर गाँव आया। कुछ दिन अपने रिश्तेदारों को मिलने के बाद एक दिन मैं दारी के घर की ओर चल पढ़ा। जब मैं वहां पहुंचा तो घर में दारी का एक पड़ोसी था। उसे भी मैं जानता ही था। चारपाई पर बैठ कर बातें करने लगे। उस ने बताया कि यह घर उस ने खरीद लिया था। फिर मैंने दारी के बारे में पूछा तो जो उस ने बताया, सुन कर मैं हैरान हो गया। उस ने बताया कि दारी अब ठीक नहीं रहता था। उस के बेटे आते जाते रहते थे और उस को अपने साथ ले जाने को बोलते रहते थे लेकिन दारी अपने बेटों से एक बात ही कहा करता था कि धर्म परिवरन से तो मर जाना अच्छा, अपने पुरखों को मैं किया मुंह दिखलाऊंगा। आखर में उस के बेटे अपने धर्म में घर वापसी के लिए रज़ामंद हो गए थे, गाँव आ कर उस के बेटों ने बहुत बड़ा समागम किया था और कुछ रस्मों के बाद गाँव के लोगों के सामने ईसाई धर्म छोड़ कर वापस अपने धर्म में शामल हो गए। सारे गाँव को भोज दिया गया था। उस दिन दारी देखने लायक था, बहुत खुश था और अपने बेटों पर गर्व कर रहा था और उन के साथ जाने को राजी हो गया था। उस की सीट बुक हो गई थी लेकिन जाने से एक दिन पहले ही दिल का दौरा पढ़ने से संसार छोड़ गया। कुछ भी हो भाई, दारी खुश खुश ही इस संसार से गया। कुछ देर बैठ कर दारी के बारे में सोचता सोचता मैं घर की ओर चल पढ़ा।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.